सुयश सोनी/फिंगेश्वर

फिंगेश्वर के पश्चिम दिशा में विराजित मां मौली महल या मंदिर में रहना नहीं चाहती थीं, इसलिए आज भी तालाब खंड के पास मिट्टी से बने व घासफूस से ढंके खद्दर से बनी झोपड़ी में माता विराजमान हैं। यहां दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामना लिए आते हैं और जोत प्रज्ज्वलित कराते हैं। गोड़वाना राज फिंगेश्वर नगर के पश्चिम दिशा में विराजित मां मौली माता का विशाल मंदिर प्रांगण है। तात्कालिन राजा ठाकुर दलगंजन सिंह द्वारा माता की निवास के लिए महल बनाने की योजना बनाई गई जिससे माता द्वारा अस्वीकार कर घास फूस की खद्दर वाली झोपड़ी में रहने की बातें कही थी।

पौराणिक मान्यता व प्राप्त जानकारी के अनुसार 18वीं शताब्दी में फिंगेश्वर राज के राजा ठाकुर दलगंजन सिंह यात्रा में जा रहे थे तभी अचानक हमलावरों ने आक्रमण कर दिया। वहीं मौली माता एक बुढ़िया के रूप में आईं वहां राजा ठाकुर दलगंजन सिंह हमलावरों से घिर गए थे। असहाय अवस्था में युद्घ क्षेत्र के पास अचानक माताजी का राजा से मुलाकात हुई। माता मौली (बुढ़िया के रूप में) ने असहाय राजा को आशीर्वाद व अलौकिक शक्तियां दी। इन दैवीय शक्तियां पाते ही असहाय राजा दलगंजन सिंह उठ खड़े हुए और हमलावरों के साथ युद्घ किया और विजयी हुए। तब उक्त स्थल पर राजा माता के पास जाकर प्रणाम किया और वापस अपने महल की ओर आने लगे। वहां वृद्घा (बुढ़िया) का रूप लेकर बैठी माता भी राजा के साथ उनकी रक्षक बनकर पीछे-पीछे आने लगी। तब राजा को अदृश्य शक्ति का अनुभव हुआ। राजा के निवेदन पर माताजी सांग (रथ, डोला) में बैठकर फिंगेश्वर राज महल आईं। वहां आदर सम्मान पूर्वक वृद्घा माताजी की पूजा पाठ की गई, लेकिन बुढ़िया के रूप में उपस्थित माता मौली महल, मंदिर जैसे स्थान पर नहीं रहना चाहती थीं और राजा दलगंजन को अपने रहने की उचित स्थान मिट्टी से बना घर व घास से ढके हुए छावनी में रहने की इच्छा बताई। बुढ़िया (वृद्घा) रूप में मौली माता फिंगेश्वर राज महल के पश्चिम दिशा में तालाब खंड में स्थापित हैं। तात्कालिन राजा ठाकुर दलगंजन सिंह द्वारा माता की निवास के लिए महल बनाने की योजना बनाई गई जिससे माता द्वारा अस्वीकार कर घास फूस की खद्दर वाली झोपड़ी में रहने की बातें कही थी।

ब्राह्मण नहीं, हल्बा समाज का पुजारी करता है पूजा

पौराणिक व इतिहासिक मंदिरों में आज भी ब्राम्हण कुल के लोग मंदिरों में पूजा अर्चना करते है पर माता मौली ने राजा दलगंजन को स्वप्न में इच्छा जताते हुए कहा था कि मेरे मंदिर की पूजा किसी हल्बा समाज के व्यक्ति से कराई जाए, जो मंदिर का पुजारी होगा। जिसके बात राजा दलगंजन ने धमतरी क्षेत्र से हल्बा जाति को माता के पूजा अर्चना के लिए बसाया, जो आज भी नगर के एक वार्ड में जाति बहुल्य होकर निवास कर रहे हैं। मंदिर प्रांगण में मुख्य खद्दर मंदिर के अलावा बाद में भवन बनाकर अलग से प्रतिमा स्थापित की गई है जहां सुहागिन द्वारा माता का श्रृंगार कर दांपत्य जीवन के लिए कामना की जाती है। माता मौली का निवास स्थान जो घास फूस से बना है मौली माता की झोपड़ी में खदर के घास के लिए राजा साहब ने 150 एकड़ जमीन रखे हैं जिसमें अब भी घास लाकर खदर बनाया जाता था जो आज भी है।

पूर्व राज्यपाल, मुख्यमंत्री भी पहुंचे थे माता के दरबार

माता मौली के भक्तों की कतार में इसी आस्था को लेकर यहां पूर्व राज्यपाल स्व. उर्मिला सिंह हिमांचल प्रदेश, पूर्व मुख्यमंत्री रमनसिंह, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष काल में तथा कई मंत्री से लेकर विधायकों ने मनोकामना पूर्ति व समृद्घि के लिए यहां आस्था के ज्योत कलश प्रज्ज्वलित किया है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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