नवापारा-राजिम। छत्तीसगढ़ के प्रयागराज गरियाबंद जिले के राजिम नगरी के महानदी, पैरी और सोंढूर नदी के संगम स्थल पर 27 फरवरी से 11 मार्च तक माघी पुन्नाी मेला लगेगा। मेले के दौरान केवल छत्तीसगढ़ राज्य व देशभर से ही नहीं अपितु विदेशी सैलानी भी पहुंचेंगे। यही कारण है कि यहां मेले के दौरान श्रद्घालु भक्तों की भीड़ रहती है। बड़ी संख्या में देशभर के व्यापारी यहां व्यापार करने पहुंचते हैं।

राजिम मेले का आकर्षण का एक और मुख्य केंद्र होता है मीना बाजार। यहां की खूबसूरती और भीड़ अलग ही देखते बनती है। यहां मनोरंजन के सभी साधन को लेकर खाने-पीने के भी बहुत सारी व्यवस्था होती है। आसमान को छूते झूले, ड्रैगन ट्रैन, ब्रेक डांस व मौत कुआं जैसे मनोरंजन के साधन मेले में आने वाले हरेक शख्स को अपनी ओर खींचता है।

मेला परिसर की निगरानी तीसरी आंख सेः एसपी भोजराज पटेल ने गुरुवार को गरियाबंद जिले से पहुंचे पुलिस जवान, सैनिक, होमगार्ड व अन्य टीमों का निरीक्षण किया और उनसे रूबरू होकर चर्चा की। उन्होंने 15 दिनों तक आयोजित हो रहे राजिम मेला से अवगत कराते हुए उन्हें सुरक्षा को लेकर हर आवश्यक जानकारी दी और उन्हें हर हाल में अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए समझाया। वहीं मेला के दौरान किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना व स्थिति सहित सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए पूरे मेला परिसर में सीसीटीवी कैमरे की भी व्यवस्था की गई है।

माता सीता ने रेत से स्थापित किया था शिवलिंगः पुरातत्ववेत्ता राजिम के सुप्रसिद्घ राजीव लोचन मंदिर को आठवीं या नौवीं सदी का बताते हैं। यहां कुलेश्वर महादेव का भी मंदिर है जो संगम स्थल पर स्थित है। जनश्रुति के मुताबिक अलौकिक शिवलिंग को वनवास काल के दौरान दंडकारण्य आगमन पर माता सीता ने स्वयं अपने हाथों से रेत के कणों से स्थापित किया था। यहां तीन नदियों का संगम है इसलिए इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। यह तीनों नदिया क्रमश छत्तीसगढ़ की जीवन दायिनी नदी महानदी, पैरी नदी तथा सोंढुर नदी है।

राजिम लोचन महोत्सव, राजिम कुंभ और फिर राजिम माघी पुन्नाी मेला तक का सफरः यहां प्रति वर्ष होने वाले कुंभ मेले को राजिम कुंभ के नाम से भी जाना जाता है। अब इस कुंभ को राजिम पुन्नाी मेला महोत्सव कहा जाने लगा है। सन 2001 में तो यह राजिम लोचन महोत्सव के नाम से जाना जाता था। यह मेला प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक पंद्रह दिनों लगता है। मेले भारतीय ग्रामीण संस्कृति का अभिन्ना अंग हैं। अधिकांश मेले किसी तीर्थ स्थान अथवा शुभ अवसर से संबद्घ होते हैं। सामाजिक व धार्मिक रूप से महत्वूर्ण इन मेलों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है। छोटे गांवों में बाजार का अभाव होता है, यहां के लोग इन मेलों से ही वह वस्तुएं खरीदते हैं जो उनके गांव में आम दिनों में नहीं मिलतीं।

राजिम तेलिन के नाम पर राजिम का हुआ नामकरण

राजिम नगरी के नामकरण के संबंध में जनश्रुति के अनुसार राजा जगतपाल इस क्षेत्र पर राज कर रहे थे तभी कांकेर के कंडरा राजा ने इस मंदिर के दर्शन किए और उसके मन में लोभ जागा कि यह मूर्ति तो उसके राज्य में स्थापित होनी चाहिए। वह सेना की सहायता से इस मूर्ति को बलपूर्वक ले चला। मूर्ति को एक नाव में रखकर वह महानदी के जलमार्ग से कांकेर रवाना हुआ पर धमतरी के पास रूद्री नामक गांव के समीप नाव डूब गई और मूर्ति शिला में बदल गई। डूबी नाव वर्तमान राजिम में महानदी के बीच में स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर की सीढ़ी से आ लगी। राजिम नामक तेलिन महिला को यहां नदी में विष्णु की अधबनी मूर्ति मिली जिसे उसने अपने पास रख लिया। इसी समय रतनपुर के राजा वीरवल जयपाल को स्वप्न हुआ, फलस्वरूप उसने एक विशाल मंदिर बनवाया। राजा ने तेलिन से मंदिर में स्थापना के लिए विष्णु मूर्ति देने का अनुरोध किया, तेलिन ने राजा को इस शर्त पर मूर्ति दी कि भगवान के साथ उनका भी नाम जोड़ा जाए। इस कारण इस मंदिर का नाम राजिमलोचन पड़ा, जो कालांतर में राजीव लोचन कहलाने लगा। मंदिर परिसर में आज भी एक स्थान राजिम के लिए सुरक्षित है।

Posted By: Nai Dunia News Network

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

 
Show More Tags