गरियाबंद (नईदुनिया न्यूज)। नगर पालिका गरियाबंद में कांग्रेस द्वारा नगर उपाध्यक्ष के विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर 9 दिसंबर को फैसला होगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी है क्योंकि स्पष्ट रूप से बहुमत ना ही कांग्रेस के पास (अविश्वास के लिए) है और ना ही भाजपा के पास (सत्ता के लिए) है। बदलते समीकरण में 15 वार्ड वाली नगर पालिका में वर्तमान में कांग्रेस के पास 8 पार्षद (बहुमत) होने के बाद भी सत्ता से बाहर है।

वहीं 7 पार्षदों के साथ भाजपा के अध्यक्ष उपाध्यक्ष सत्ता में काबिज है। ताजा हालात में अविश्वास के लिए कांग्रेस को तीन और पार्षदों की आवश्यकता है। भाजपा को केवल अपने पार्षदों को संगठित रखना है। ऐसे में यह देखना लाजिमी होगा कि परीक्षा के दौरान क्या वे तीन पार्षदों का समर्थन जुटाने में सफल होते हैं या फिर यह विश्वास गिर जाएगा।

मालूम हो कि गत 24 नवंबर को नगरपालिका के कांग्रेस समर्थित 8 पार्षदों ने एक साथ होकर नगरपालिका के उपाध्यक्ष सुरेंद्र सोनटेके के विरुद्ध जनहित के मुद्दों पर ध्यान नहीं देने, परिषद एवं पीआईसी के बैठक में बुलाने में आनाकानी करने का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव के लिए कलेक्टर प्रभात मलिक को ज्ञापन सौंपा था। इसके बाद से नगर की राजनीति में गर्माहट आ गई थी।

चर्चा इस बात को लेकर भी हो रही थी कि अविश्वास प्रस्ताव के एक दिन पहले जोगी कांग्रेस से कांग्रेस में शामिल हुए दो पार्षदों ने अपने सभापति पद से भी इस्तीफा दे दिया था। जबकि कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी 10 महीनों तक वे सभापति के पद पर काबिज थे। उनके इस्तीफे के कारण के पीछे भी कई प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं।

इधर बीते 14 दिनों तक नगर में अविश्वास प्रस्ताव को लेकर चर्चा का दौर जारी रहा। एक ओर जहां भाजपा संगठित और अनुशासित पार्टी के रूप में जानी जाती है इसे देखते हुए लोगों के जेहन में यह बात तो साफ है की भाजपा में भितरघात की संभावना न के बराबर है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव को लेकर किस प्रकार की रणनीति तैयार कर रही होगी इसे लेकर भी चर्चा होती रही। भाजपा और कांग्रेस के पार्षद भी इस दौरान लोगों के निशाने पर रहे।

क्या कहते हैं आंकड़े

उल्लेखनीय है कि जब 2019 में नगरीय निकाय चुनाव हुए थे उस वक्त भाजपा ने नगरपालिका के 15 में से 8 वार्डों में जीत दर्ज की थी। वही 5 वार्डों में कांग्रेस और दो में जोगी कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। तब भाजपा से जीते एक पार्षद ने सत्ता के लालच में कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इसके बाद भी दो जोगी कांग्रेस के दो पार्षदो के समर्थन से भाजपा अपना नगर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाने में सफल हुई थी। कालांतर में जोगी कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए।

इस दौरान जोगी कांग्रेस पार्षदों ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया था। जिसके चलते नगरपालिका में कांग्रेसी पार्षदों की संख्या आठ (एक भाजपा बागी सहित) पहुंच गई थी। तब से ही नगर पालिका में उलटफेर चर्चा शुरू हो गई थी, लेकिन तब स्थिति सामान्य रही। जोगी कांग्रेस से कांग्रेस में शामिल हुए दो पार्षदों ने अपना सभापति पद भी नहीं छोड़ा था। जिसके चलते तमाम कयासों पर उसी समय विराम लग गया था।

Posted By: Pramod Sahu

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