देवभोग। कोरोनाकाल को मद्देनजर रखते हुए अंचल की महिलाओं ने घर पर ही वट सावित्री पूजा की। इसमें उन्होंने घर पर बरगद का पौधा लगाकर कोरोना महामारी के प्रति सुरक्षा भाव रखते हुए मान्यता निभाने का फर्ज भी एक साथ अदा किया। जबकि सामान्य दिनों में अंचल की महिलाएं बड़ी संख्या में राजा तालाब स्थित शिव मंदिर के बरगद में पेड़ पर वट सावित्री की पूजा करा करती थीं।

वहीं इस साल अमावस्या दो दिन होने से लोगों में वट सावित्री के लिए असमंजस रहा। पंचांग और कलेंडर में अलग-अलग तिथि में वट सावित्री व्रत होने से कुछ सुहागिनों ने बुधवार को तो कुछ ने गुरुवार को उपवास रखा। इस दौरान उन्होंने निर्जला व्रत रखकर वट की पूजा की। बरगद के 11 फेरे लगाकर रक्षा सूत्र बांधा। पति की दीर्घायु होने और परिवार की खुशहाली की कामना की।

पूजा होने के बाद बरगद के फल को ही बिना चबाए पानी से निगलकर महिलाओं ने व्रत तोड़ा। साथ ही गुरुवार को वट सावित्री की पूजा करने वाली महिलाओं ने ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि में शनि जयंती की भी पूजा की।

हिंदू धर्म में बरगद पेड़ की पूजा करने के वैज्ञानिक कारण

वट की पूजा करने में आध्यात्मिक नजरिए के साथ वनस्पति-विज्ञानिक के मर्म को भी समझना जरूरी है। रायपुर की बाटनिस्ट व माइक्रोबायोलाजी प्राची साहू ने बताया कि बरगद सबसे ज्यादा आक्सीजन देने वाला वृक्ष है। साथी ही इसके फल, दूध समेत छाल में अनेक तरह के औषधीय गुण भी मौजूद हैं। यही नहीं वट वृक्ष वातावरण शुद्घ रखने, मृदा अपरदन व भूजल स्तर बनाए रखने में कारगर साबित होता है। इसलिए हिंदू धर्म में बरगद की पूजा करने बेहद तार्किक कारण बनाए गए हैं। लिहाजा बरगद की पूजा करके इसे सम्मान दिया जाता है। यह प्रथा बेहद पुरानी है। साहू ने कहा कि पूजा मात्र तक सीमित रहने के अलावा इन पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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