जगदलपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान इन दिनों छह दिवसीय सूरत पर्वत परिक्रमा जारी है। फूल और विजय रथ परिक्रमा विधान के पूर्व मां दंतेश्वरी के छत्र को सलामी देते समय अति विशिष्टजनों को ही रथ के सामने खड़े होने का अधिकार है लेकिन अपात्र भी सलामी के दौरान रथ के सामने खड़े हो जाते हैं। इस बात को लेकर पूजारियों जबरदस्त नाराजगी देखी जा रही है।

बस्तर दशहरा और फागुन मड़ई के समय मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र को गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा है। रियासत काल में बंदूकधारी राजा की उपस्थिति में दंतेवाड़ा में मावली माता की डोली को तथा बस्तर दशहरा का समय फूल रथ और विजय रथ में मांईजी का छत्र चढ़ाने के बाद गार्ड आफ ऑनर देने की परंपरा रही। आजाद के बाद यह परंपरा विधिवत जिला पुलिस बल के जवानो द्वारा निभाई जा रही है।

लोक साहित्यकार रूद्र नारायण पाणीग्राही कहते हैं कि माना जाता है वर्ष 1350 के आसपास अन्नमदेव के शासन काल में दंतेवाड़ा में फागुन मेला की शुरुआत हुई होगी। वहीं वर्ष 1409 - 10 में महाराजा पुरुषोत्तम देव को रथपति की उपाधि मिलने के बाद उनके शासनकाल में ही दशहरा उत्सव मनाने और माता के छत्र को गार्ड आफ ऑनर देने की परंपरा शुरु हुई थी।

मां दंतेश्वरी शक्तिपीठ दंतेवाड़ा के प्रधान जिया हरेंद्रनाथ तथा जगदलपुर दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी बताते हैं कि मां दंतेश्वरी का छत्र हो या माता मावली की डोली। इन्हें गार्ड आफ ऑनर देते समय राजा या बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष, वरिष्ठ पदाधिकारियों तथा अति विशिष्टजनों को ही खड़े होने का अधिकार है। लंबे समय से देखा जा रहा है कि बस्तर दशहरा में शामिल होने जा रहीं माता मावली की डोली और दंतेश्वरी माता के छत्र के पास अपात्र लोग खड़े हो जाते हैं।

यह एक तरह से माताओं का अनादर है। लगातार समझाने के बावजूद कथित लोग इस पूजा विधान के दौरान स्वयं खड़े होकर खुद को हास्यास्पद बना रहे हैं। विधान के दौरान मौजूद आधिकारी भी राजनीति के चलते अपात्रों को नहीं हटा पाते। हमारी अपील है कि दशहरा के पूजा विधानों को हल्के में न लें।

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