Bastar Dussehra: हेमंत कश्यप, जगदलपुर। पूरी दुनिया में सबसे लंबे समय तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा सामाजिक समरसता और सहकारिता का सबसे बड़ा उदाहरण है। 75 दिनों तक चलने वाले इस महा उत्सव को मनाने के लिए जहां विभिन्‍न जातियों के लोग सहयोग करते हैं वहीं विभिन्‍न रस्मों के साथ इसे संपन्ना कराने में कम से कम 20 हजार लोगों की सहभागिता होती है। विशाल चित्रकोट जलप्रपात अगर बस्तर का पर्याय है तो 610 वर्षों से मनाया जा रहा दशहरा बस्तरवासियों का सबसे बड़ा उत्सव है।

रथ परंपरा के साथ बस्तर के इस अनूठे दशहरे का शुभारंभ भूतपूर्व चक्रकोट राज्य में हुआ था। चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में उन दिनों चक्रकोट की राजधानी बड़ेडोंगर थी। चक्रकोट एक स्वतंत्र राज्य था। राजा पुरूषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। बस्तर इतिहास के अनुसार वर्ष 1408 के कुछ समय पश्चात राजा पुरषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी की पदयात्रा की थी। वहां भगवान जगन्नााथ की कृपा से उन्हें रथपति की उपाधि दी गई थी। उपाधि के साथ उन्हें 16 पहियों वाला विशाल रथ भी भेंट किया गया था।

उन दिनों बस्तर के किसी भी इलाके की सड़कों में इन्हें चलाना मुश्किल था, इसलिए 16 पहियों वाले विशाल रथ को तीन हिस्सों में विभक्त कर दिया गया। चार पहियों वाला रथ भगवान जगन्नााथ के लिए बनाया गया वहीं बस्तर दशहरा के लिए दो रथ बनाए गए। इन्हें क्रमशः फूल रथ और विजय रथ कहा जाता है। फूलरथ तिथि अनुसार पांच से छह दिनों तक चलता है। इसमें चार पहिए होते हैं, वहीं दशहरा व दूसरे दिन चलने वाले आठ पहिए के विशाल विजय रथ कहते हैं। इस रथ संचलन को स्थानीय भीतर रैनी और बाहर रैनी कहते हैं। बस्तर दशहरा की रस्में हरियाली अमावस्या के दिन पाटजात्रा (काष्ठपूजा) से प्रारंभ हो जाती हैं। विभिन्‍न रस्में दिन विशेष के हिसाब से 75 दिनों तक चलती रहती हैं।

बस्तर दशहरा को सामाजिक समरसता और सहकारिता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। दशहरा महोत्सव के दौरान विभिन्‍न विधानों को संपन्ना कराने बस्तर की विभिन्‍न जातियों की सहभागिता होती है। वे दशहरा पूजा विधान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। बताते चलें कि रथ निर्माण हेतु जंगल से लकड़ी लाने के लिए अगरवारा, कचोरापाटी और रायकेरा परगना के आदिवासी निश्चित हैं। तीनों परगना के विभिन्‍न लोग इस कार्य में भागीदार बनते हैं। प्रत्येक गांव के प्रत्येक घर से एक सदस्य सम्मिलित होता है। झार उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के बढ़ई तथा लुहार मिलकर बस्तर दशहरा के विशालकाय रथ का निर्माण कार्य प्रतिवर्ष बड़ी जिम्मेदारी के साथ करते हैं।

काछनगादी का कार्यक्रम बस्तर दशहरे का प्रथम चरण माना जाता है। इस कार्यक्रम का दायित्व अंचल का मिरगान जाति बड़ी ही भक्तिभाव के साथ पूरा करता है। आमाबाल और पराली गांव के लोग वंशानुगत जोगी बैठते आ रहे हैं। करंजी, केसरपाल और सोनाबाल गांव के आदिवासी रथ खींचने के लिए सिहाड़ी छाल से रथ खींचने मोटी रस्सी का निर्माण पूरी तन्मयता के साथ करते हैं।

एरंडवाल सहित पांच गांवों के राऊत निशाजात्रा की शाम प्रसाद तैयार करते हैं। केवट, नाईक और पनारा जाति की सधवा महिलाएं फूल रथ परिक्रमा के पहले चना लाई और विशेष प्रकार की रोटियां न्योछावर करती हैं। चार पहियों वाले फूल रथ को कचोरापाटी और अगरवारा परगना के ग्रामीण खींचते हैं, वहीं आठ पहियों वाले विजय रथ को किलेपाल क्षेत्र के माड़िया खींचते हैं।

भीतर रैनी और बाहर रैनी कार्यक्रम में भतरा जाति के नौजवान निश्चित गांवों से आकर भगवान राम की तरह धनुकांड्या धनुषधारी बनकर उत्सव की शोभा बढ़ाते रहे हैं। यह भी बताना जरूरी है कि विशालकाय रथ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी लगाने वाले आदिवासी गढ़िया गांव से आते हैं। इधर रथ के ऊपर से कपड़ा फेंकने वाले कपड़दार अलग होते हैं।

610 साल से अनवरत जारी बस्तर दशहरा

बस्तर में रियासत कालीन 22 मंदिर हैं। इनकी देखरेख टेंपल इस्टेट कमेटी करती है। दशहरा के दौरान इन मंदिरों में विशेष पूजा होती है। दशहरा महोत्सव के विभिन्‍न निर्माण कार्यों, पूजा विधानों और आमंत्रित छह सौ से ज्यादा देवी- देवताओं के सत्कार आदि कार्यों को संभालने काफी लोगों की आवश्यकता होती है। बस्तर दशहरा महोत्सव को संपन्ना कराने गांव के अदना से ग्रामीण से लेकर जिला व पुलिस प्रशासन के जवानों सहित कम से कम 20 हजार लोगों की सहभागिता होती है। करीब 610 साल से अनवरत जारी बस्तर दशहरा में ऐसी कोई वारदात नहीं हुई जिसने इस महापर्व को कलंकित किया हो।

देश-विदेश से आते हैं सैलानी

बस्तर दशहरा को देखने देश विदेश के लोग आते हैं परंतु लॉकडाउन के चलते इस बार सैलानियों से अनुरोध किया गरया है कि वे बस्तर दशहरा महोत्सव में इस वर्ष शामिल न होकर वैश्विक महामारी कोरोना को समाप्त करने में मदद करें।

Posted By: Nai Dunia News Network

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