हेमंत कश्यप

जगदलपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में फूल रथ परिक्रमा की शुरुआत मंगलवार से हो गई। द्वितीय से लेकर सप्तमी तक इस रथ को छह दिनों तक खींचा जाएगा। इसकी शुरुआत 411 साल पहले राजा वीरसिंह देव ने की थी। चार पहियों वाला फूल रथ तथा विजयादशमी के दिन खींचे जाने वाले विजयरथ में आठ पहिए होते हैं। बस्तर दशहरा की शुरुआत राजा पुरषोत्तम देव के शासनकाल में प्रारंभ हुई थी। उन्हें जगन्नााथ पुरी में रथपति की उपाधि के साथ सोलह पहियों वाला रथ प्रदान किया गया था। 16 पहियों वाला रथ पहली बार वर्ष 1410 में बड़ेडोंगर खींचा गया था।

चार पहिया रथ भगवान जगन्नााथ को समर्पित

महाराजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नााथ के भक्त थे इसलिए उन्होंने 16 पहियों वाले रथ से चार पहिया अलग कर गोंचा रथ बनवाया। जिसका परिचालन गोंचा पर्व में किया जाता है। इस तरह 12 पहियों वाला दशहरा रथ कुल दो सौ साल तक खींचा गया।

परिचालन में आई परेशानी

12 पहियों वाले विशाल रथ को खींचने में परेशानी आती थी इसलिए वर्ष 1610 में राजा वीरसिंह देव ने इसे दो हिस्सों में विभक्त करवा दिया। चार पहिया वाला फूल रथ तथा आठ पहियों वाला विजय रथ कहलाया। फूल रथ में राजा सादगीपूर्ण परिधान में फूलों का मुकुट पहन देवी का छत्र लेकर सवार होते थे। रथ भी फूलों से सजा होता था।

इसके चारों तरफ पेट्रोमैक्स (रोशनी के लिए गैस बत्ती) लटकाए जाते थे इसलिए इसे फूल रथ नाम मिला। दशहरा के दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। वहीं दूसरी तरफ भगवान राम ने रावण का वध कर किया था। इस विजय की खुशी में देवी छत्र को आठ पहियों वाले रथ में आरुढ़ कर महाराजा लौटते थे। इसीलिए यह विजय रथ कहलाया। बस्तर दशहरा उत्सव में यह दोनों रथ चार सौ ग्यारह वर्षो से क्रमबद्ध खींचे जा रहे हैं।

देवी को समर्पित दशहरा

लोक साहित्यकार रुद्रनारायण पानीग्राही बताते हैं कि फूल रथ प्रतिवर्ष द्वितीय से सप्तमी तक छह दिन तथा विजय रथ विजयादशमी तथा एकादशी के दिन भीतर रैनी तथा बाहर रैनी के रूप में दो दिन खींचा जाता है। भारत के पूर्व उत्तर राज्यों में शक्तिपूजा होती है। यह प्रभाव बस्तर में भी है। दोनों रथों में देवी आरूढ़ होती हैं इसलिए यहां रावण वध जैसी परंपरा नहीं हैं।

Posted By: Pramod Sahu

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