जगदलपुर। Bastar News: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में हर साल अंचल के करीब 450 देवी-देवता आते रहे हैं। कोरोना बीमारी के वर्तमान दौर में इनकी संख्या आधी रही। करीब 250 देवी-देवताओं को गुरूवार को कुटुंब जात्रा में विदा किया गया। पहले विधान पाटजात्रा से बस्तर दशहरा की शुरूआत होती है जिसमें बिलोरी ग्राम से लाई गई साल लकड़ी की पूजा बेड़ा उमरगांव व झार उमरगांव के नाइक द्वारा की जाती है। इस साल 20 जुलाई को यह रस्म निभाई गई थी। वहीं अंतिम रस्म 31 अक्टूबर (शनिवार) को श्री मावली माता की विदाई पूजा के रूप में निभाई जाएगी। 75 दिन तक विभिन्न रस्मों-रिवाजों व परंपराओं के साथ चलने वाला बस्तर दशहरा इस साल अधिमास की वजह से 101 दिन का रहा। कोराेना वायरस के दौर में मनाया गया यह पर्व लंबे समय तक याद किया जाएगा।

संक्रमण की आशंका में कोराना गाइडलाइन की छाया सभी विधानों पर पड़ी। विशेष एहतियात के साथ परंपरा का निर्वहन किया गया। जन समुदाय के एकत्रण को रोकने आनलाइन प्रसारण की व्यवस्था भी जिला प्रशासन ने की थी।

बस्तर दशहरा में संभाग के सभी जिलों के साथ धमतरी के नगरी-सिहावा क्षेत्र के कुछ गांव व ओडिशा से हर साल देवी-देवता पधारते हैं। इनके आने का क्रम मावली परघाव के आसपास से शुरू होता है।

राजस्व विभाग के अधिकारियों के मुताबिक दशहरा की पहली पूजा व कलश स्थापना के समय इन सभी का आव्हान कर आमंत्रित किया जाता है। हर साल करीब 450 देवी-देवता यहां आते हैं लेकिन इस बार अंचल के करीब 250 देवी-देवता ही पधारे। प्रमुख रस्मों के शुरू हाेने से पहले संभाग के सातों जिलों में कलक्टरों ने अपने यहां के जनप्रतिनिधियों के साथ मांझी, चालकी व पुजारियों की बैठक लेकर उन्हें कोरोना संक्रमण के वर्तमान हालात से वाकिफ कराया। सीमित संख्या में जगदलपुर आने को उन्होंने अपनी सहमति दी। ग्रामीण इलाकों में यातायात व्यवस्था सुचारू रूप से न चलने का भी असर पड़ा। इसके चलते कई जगहों के देवी-देवता नहीं आ पाए। जो आए थे उनकी गुरूवार को कुटुंब जात्रा में विधि-विधानपूर्वक पूजा कर विदाई हुई।

दक्षिणा में मिलते हैं 51 रुपये

दशहरा में आने वाले देवी-देवताओं को विदाई के अवसर पर दक्षिणास्वरूप 51 रुपये भेंट किए जाते हैं। तहसील कार्यालय में इनके लिए बनाई जाने वाली अन्नपूर्णा कोठी से चावल, दाल, तेल, नमक आदि भी साथ आए पुजारियों व सेवादारों को दिया जाता है। कुटुंब जात्रा के नाम से विदाई की इस रस्म को गंगामुंडा जात्रा भी कहा जाता है। ग्रामीण देवी-देवताओं का कुटुंब सुबह से गंगामुंडा में एकत्र हुआ। यहां का वातावरण देव-धामियों के सम्मेलन जैसा रहा। मावली माता की अगुवाई में देवी-देवताओं के समक्ष पूजा-अर्चना के बाद देव-धामियों के सम्मान में बकरे की बलि दी गई और उन्हें ससम्मान विदा किया गया।

Posted By: Himanshu Sharma

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस