हिमांशु/हेमंत कश्यप, जगदलपुर। जिंदगी में लक्जरी की चाहत इंसान के अंदर बढ़ती जा रही है। लोग जीवन की बेहतर सुविधाओं की चाहत में गांवों को छोड़कर शहर आते हैं। गांवों में रह रहे लोग शहरी सुविधाओं का गांव में ही अब उपयोग कर पा रहे हैं, ऐसे दौर में छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक ऐसा गांव भी है जो इस तरह की सुख-सुविधाओं से कोसों दूर है।

यहां बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। मोबाइल नेटवर्क की तो आप यहां कल्पना भी नहीं कर सकते। और तो और बारिश के दिनों में चार पहाड़ियों से घिरे कुडूमखोदरा गांव का संपर्क देश-दुनिया से कट जाता है। इस सबके बावजूद इस गांव में जिंदगी बेहद खुशहाल है। शायद नक्सलवाद से लड़ रहे बस्तर का यह सबसे खुशहाल गांव है, जहां लोग बाहरी कोलाहल से दूर सुकून की जिंदगी जी रहे हैं।

बस्तर जिले में चार पहाड़ियों के बीच गहरी खाई में कुडूमखोदरा गांव के लोगों को सुख सुविधाओं की चाह नहीं है। उनकी अपनी अलग जिंदगी है। आसमान छूते पेड़ों वाला जंगल, कल-कल बहता झरना, तरह-तरह के फूलों की खुश्बू और एक सुकून देवी वाली हवा के साथ ही इस गांव में बहुत कुछ है।

यहां पिछले 200 वर्षों से जिंदगी आबाद है। चार पहाड़ी नाले और दुर्गम मार्ग होने के कारण यहां बारिश के दिनों में देश-दुनिया से यहां के लोगों का संपर्क कट जाता है। यहां मोबाइल और इंटरनेट की भी पहुंच नहीं है, इसके बावजूद यहां के लोग अपनी जिंदगी में खुशहाल हैं। यह गांव दरभा ब्लॉक के इस पूर्व पंचायत का हिस्सा है।

दंडकारण्य पठार में पहुंचने के लिए केशकाल घाट चढ़कर 7 किलोमीटर ऊपर जाना पड़ता है। इसी रास्ते पर दूसरी तरफ कुडूमखोदरा तक पहुंचने के लिए लोगों को 60 किलोमीटर नीचे गहरी घाटी में उतरना पड़ता है। यह गांव तीरथगढ़ जलप्रपात से करीब 25 किलोमीटर दूर है और पहली बार मीडिया की टीम बारिश के दिनों में यहां तक पहुंची है।

कधो वन मार्ग और चार पहाड़ी नालों को पार कर जब कुडूमखोदरा पहुंचे और चारों तरफ नजर घुमाकर देखा तो यह जगह एक लैंडलॉक एरिया जैसी नजर आई, जो चारों ओर पहाड़ से घिरी है। सबसे पहले सरकारी स्कूल का भवन दिखाई दिया। यहां पहुंचे तो स्कूल में कुल 22 बच्चे थे, जो पढ़ाई में मशगूल दिखे।

गांव के लोग ग्रामीण कृषि कार्य में व्यस्त दिखे। आगे आंगनबाड़ी में 18 बच्चे खेलते मिले। गांव में 25 साल पहले वन विभाग द्वारा स्कूल भवन, आंगनबाड़ी, मनोरंजनगृह का निर्मांण किया गया था। इसी समय यहां बिजली पहुंचाने की तैयारी हुई। खंबे लगाए गए और तार भी बिछाए गए, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि गांव में बिजली आज तक नहीं पहुंची।

चार पहाड़ियों से घिरे इस गांव के उत्तर में टांगरी, दक्षिण में साधु, पूर्व में तूरे और पश्चिम में उदय नाम की पहाड़ियां हैं। इन पहाड़ियों से पानी बस्ती में आता है और यही इस गांव के जीवन का आधार है। यह गांव स्कूल पारा और लोहरा पारा नामक दो बस्तियों में बंटा है।

गांव की कुल आबादी 403 है जो 102 घरों में रहते हैं। इस गांव में रहने वाले ज्यादातर माडिया आदिवासी परिवार हैं। यहां के ग्रामीण बताते हैं कि यह बस्ती करीब 200 साल पुरानी है। किसी जमाने में यहां राज परिवार के सदस्य और अंग्रेज अफसर शिकार के लिए आते थे, इसलिए वन विभाग ने नीचे बस्ती तक मोर्चा बनाया था। यहां के ग्रामीण कोदो-कुटकी के अलावा साग सब्जी उपजाते हैं।

इसके बाद पहाड़ी पार कर आसपास के हाट बाजारों में उसे बेचने जाते हैं। वनोपज भी इनकी आजीविका का मुख्य आधार है। बिसपुर से साढ़े सात किलोमीटर दूर कुडूमखोदरा मार्ग में चार पहाड़ी नाले हैं। बारिश के दिनों में जब इसमें पानी चढ़ता है, तक रास्ता दलदल में तब्दील हो जाता है।

बारिश के दिनों में यहां से आवागमन बिल्कुल बंद हो जाता है। जिंदगी और मौत का सवाल जब खड़ा होता है तो यहां के लोग इस दलदल को भी पार कर जाते हैं। यहां के ग्रामीण कहते हैं कि उनके गांव में जो खुशहाली और शांति है, वह दुनिया में और कहीं नहीं, इसलिए वे इस गांव से दूर नहीं जाना चाहते। अपनी इस छोटी सी दुनिया में इस गांव के लोग पूरी तरह खुश और आबाद हैं।