जगदलपुर (नईदुनिया न्यूज)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्म निशा जात्रा पूजा विधान शनिवार 24-25 अक्टूबर के मध्य रात्रि को पूरी की गई। शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि को आयोजित की जाने वाली इस महत्वपूर्ण रस्म को्र पूरी करने के लिए बस्तर राजपरिवार के सदस्य अपने राजगुरु और राजपुरोहित के साथ पूजा सामग्री और पूरी साज-सज्जा के साथ अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा गुड़ी पहुंचे।

इस दौरान सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष दीपक बैज, कलेक्टर रजत बंसल सहित बस्तर दशहरा समिति के सदस्य, मांझी चालकी और दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी भी मौजूद थे। दंतेश्वरी मंदिर से निशा जात्रा गुड़ी तक आतिशबाजी के साथ सभी का स्वागत किया गया। निशा जात्रा गुड़ी में मावली मंदिर के राउतों द्वारा तैयार प्रसाद का भोग लगाने के बाद बाकी के विधान पूरे किए गए। इसके पश्चात राजमहल के सिंहडयोढ़ी में निशा जात्रा की पूजा की गई। फिर मां दंतेश्वरी मंदिर में बस्तर की परंपरा के अनुसार पूजा की गई। मां दंतेश्वरी की आरती के साथ निशा जात्रा पूजा विधान संपन्न हुआ।

बस्तर दशहरा का तांत्रिक अनुष्ठान निशाजात्रा

बस्तर दशहरा मे बेहद ही अनोखी रस्म है निशा जात्रा। जगदलपुर में माता खमेश्वरी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर साल मे सिर्फ आश्विन शुक्ल अष्टमी को रात्रि में खुलता है। इस मंदिर में निशा जात्रा नामक एक प्रकार से तांत्रिक अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है। अश्विन शुक्ल अष्टमी की आधी रात निशा जात्रा गुड़ी में माता खमेश्वरी देवी की पूजा अनुष्ठान के बाद राज परिवार की मौजूदगी में 11 बकरों की बलि दी जाती है। अष्टमी की रात को देश की खुशहाली के लिए देवियों को मछली, कुम्हड़ा और बकरों की बलि दी जाती है। रात 12 बजे राजपरिवार भैरमदेव की पूजा-अर्चना कर हवन स्थल में 11 बकरों की बलि दी जाती है। मावली मंदिर में दो और सिंहडयोढी और काली मंदिर में एक-एक बकरे की बलि दी जाती है। दंतेश्वरी मंदिर जगदलपुर में एक काले कबूतर और सात मोंगरी मछलियां, श्रीराम मंदिर में उड़द दाल और रखिया कुम्हड़ा की बलि दी गई है।

गाय को खिलाते हैं प्रसाद

निशा जात्रा पूजा विधान के लिए भोग प्रसाद तैयार करने का जिम्मा निश्चित गांव के लोग निभाते हैं। दोपहर से ही मावली मंदिर की भोगसार में नई मटकियों में प्रसाद तैयार करने का काम शुरू हो जाता है, जिसे निश्चित गावों में बसे यादव समाज के लोग करते हैं। मध्य रात्रि 12 कांवरों में रखकर प्रसाद को मंदिर पहुंचाया जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करना निषेध होता है। इसे अगली सुबह इस प्रसाद गायों को खिला दिया जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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