जगदलपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बस्तर का मोगली के नाम से चर्चित अबूझमाड़ के गढ़बेंगाल का टाइगर ब्वाय चेंदरू अब इस दुनिया में नहीं है। उसके अदम्य साहस की चर्चा मीडिया तक होती रहती है। 18 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि है। उसके संघर्षपूर्ण जीवन से नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिए चेंदरू की जीवनी अब तक पाठ्यक्रम में शामिल नहीं की गई है।

साठ के दशक में स्वीडन की एक फिल्म कंपनी ने अबूझमाड़ में शेर के साथ खेलने वाले एक बच्चे को लेकर एक रोचक फिल्म बनाई थी। जिसके बाद आदिवासी बालक चेंदरू रातोंरात प्रसिद्ध हो गया था। नारायणपुर जिले के गढ़बेंगाल का चेंदरू चर्चित हस्ती के रूप में आज की ख्यातिलब्ध है। जिसे छत्तीसगढ़ का मोंगली के नाम से भी जानते हैं।

चेंदरू ने अल्प आयु में वह अनूठा कारनामा कर दिखाया जो आज तक किसी ने नहीं किया। चेंदरू ने बाल्यावस्था में फिल्म में काम किया था यह उसकी पहली और आखिरी फिल्म थी। फिल्म को आस्कर अवार्ड से नवाजा गया। उसके बाद आज तक किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में छत्तीसगढ़ के किसी नायक को इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली।

गुमनामी में बीता जिंदगी का बड़ा हिस्सा

छत्तीसगढ़ का मोगली तथा बस्तर का टाइगर ब्वाय के नाम से परिचित अंतरराष्ट्रीय हीरो आज हमारे बीच नहीं है। 18 सितंबर 2013 को 78 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। रविवार को उसकी नौंवी पुण्यतिथि है। एक बेहद सफल चर्चित अंतरराष्ट्रीय फिल्म के हीरो चेंदरू के जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुमनामी में भी बीता। चेंदरू द्वारा अभिनीत फिल्म को वर्ष 1958 में कांस फिल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित किया गया था।

चेंदरू के जीवन काल में उसे जो सम्मान मिलना चाहिए था उसे नहीं मिला। फिल्म के साथ ही 1960 के दशक में स्वीडिश तथा अंग्रेजी भाषा में चेंदरू के नाम से जो किताबें और फिल्म तैयार की गई थी। वह भी समय के साथ-साथ उसके स्वजन के पास अब नहीं रहीं। आज चेंदरू का परिवार मजदूरी कर गुजर बसर कर रहा है।

सचित्र पुस्तक का प्रकाशन जरूरी

चेंदरू के जीवन काल में जो फिल्म तैयार हुई थी तथा अनेक देशों में रिलीज हुई थी उसे संग्रहित किए जाने की आवश्यकता है। लोक साहित्यकार व रंगकर्मी रुद्र नारायण पाणिग्रही का कहना है कि बस्तर के पहले हालीवुड अभिनेता चेंदरू के संबंध में स्वीडिश व अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित सचित्र पुस्तक का हिंदी हल्बी तथा गोंडी बोली भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित कराना चाहिए।

फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले चेंदरू ने बाघ और तेंदुए के बीच रहकर मानव और वन्य प्राणियों के बीच मानवता का परिचय दिया। उसकी गाथा जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। चेंदरू की शौर्य गाथा प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने से आने वाली पीढ़ी को उसके जीवन से परिचित कराया जा सकेगा। यही उसे सच्ची श्रद्धांजलि व उसके स्वजन का वास्तविक सम्मान होगा।

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