अनिल मिश्रा, जगदलपुर। Chhattisgarh: सुकमा जिले के पांच गांव के 120 ग्रामीण पिछले तीन साल से बिना सुनवाई जेल में बंद हैं। इनका कसूर यह है कि इनके गांव के पास ही तीन साल पहले नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 25 जवानों की हत्या कर दी थी। इस हमले के बाद नक्सली तो भाग गए पर उनकी करतूत की सजा ग्रामीणों को भुगतनी पड़ रही है। मानवाधिकार संगठन शोर मचाते रहे पर कुछ नहीं हुआ। 25 अप्रैल 2017 को सुकमा जिले के बुरकापाल गांव के पास नक्सलियों ने सीआरपीएफ 74 वीं बटालियन के जवानों पर हमला किया था। सीआरपीएफ की टीम दोरनापाल से जगरगुंडा तक निर्माणाधीन सड़क की सुरक्षा में तैनात थी।

घटना के कुछ दिनों के बाद फोर्स ने घटनास्थल से 200 मीटर दूर स्थित बुरकापाल और इसके 10 किमी के दायरे में आने वाले पांच अन्य गांव गोंदपल्ली, चिंतागुफा, ताड़मेटला, करीगुंडम व तोंगगुड़ा के कुल 120 ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया। चिंतागुफा थाने में इन सभी पर यूएपीए समेत अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। बुरकापाल गांव की सरपंच मुचाकी हिड़मा बताती हैं कि बुरकापाल हमले के कुछ दिन के बाद उनके भाई समेत गांव के 37 लोगों को पुलिस उठाकर ले गई। गांव में जितने भी पुरूष थे सभी को पकड़कर ले गए। वही बचे हैं जो उस वक्त किसी दूसरे शहर में मजदूरी करने गए थे। इन ग्रामीणों में से कुछ की वकील बेला भाटिया बताती हैं कि बुरकापाल समेत सभी छह गांवों में पुलिस रात में एक ही वक्त पहुंंची।

अलग-अलग टीमों ने इन गांवों में जाकर सभी पुरुषों को उठा लिया। इन पर यूएपीए (अनलाॅफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) व आइपीसी के तहत मामला है। यूएपीए में चार्जशीट पेश करने के लिए 180 दिन का वक्त होता है इसलिए तीन महीने तो कुछ हुआ ही नहीं। इसके बाद तीन साल से हर महीने पेशी की तारीख बदलती रही। भाटिया ने कहा कि जगदलपुर में यूएपीए के मामलों के लिए एक ही कोर्ट है, इससे भी न्याय में देरी हो रही है। पुलिस ने बिना किसी ठोस सबूत के ग्रामीणों को गिरफ्तार किया है। उन पर ऐसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि हाईकोर्ट ने भी जमानत देने से इंकार कर दिया है।

यह है समस्या

बुरकापाल मामले में चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी गई है। अब अलग-अलग आरोपितों पर उनकी मौजूदगी मेें आरोप लगाने की प्रक्रिया होनी है। पुलिस कोर्ट में कहती रही कि 120 नक्सल आरोपितों को एक साथ कोर्ट में पेश करने लायक बल उपलब्ध नहीं है। वकीलों ने अलग-अलग समूह में आरोप तय करने की मांग की जिसे कोर्ट ने नहीं माना। वीडियो कांफ्रेंसिंग से सुनवाई की मांग भी नहीं मानी गई। समस्या का कोई हल न निकलता देख कोर्ट ने आखिरकार समूह में बांटकर आरोपितों को पेश करने की अनुमति दी। यह कार्रवाई चल ही रही थी कि कोरोना लॉकडाउन आ गया।

अभी तो कोरोना संकट की वजह से कोर्ट ऐसे मामले में पेशी की तारीख नहीं दे रहा है। अगर न्यायालय से आदेश होगा तो हम सभी को पेश करने की व्यवस्था जरूर करेंगे। नक्सल मामले में बिना ठोस आधार के किसी की गिरफ्तारी नहीं की जाती।

- सुंदरराज पी, आइजी बस्तर

Posted By: Himanshu Sharma

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