जगदलपुर। एशिया महाद्वीप में सिर्फ बस्तर के साल वनों में प्राकृतिक रूप से जन्म लेने वाला रैली कोसा डेढ़ किलोमीटर लंबा धागा देता है। इस खासियत के चलते ही पूरी दुनिया में इसकी मांग है। इसके संग्रहण में आठ हजार से अधिक ग्रामीण जुटे हुए हैं। बीते साल इन संग्राहकों ने दो करोड़ 43 लाख नग रैली कोसा एकत्र कर प्रति संग्राहक औसतन 15 हजार रुपये अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया था।

इधर रैली कोसा से धागा निकालने के कार्य में धरमपुरा और कालीपुर की 40 से अधिक महिलाएं भी लगी हुई हैं। इससे ये प्रतिमाह लगभग छह हजार रुपये का आय प्राप्त कर रही हैं। इस तरह यह रैली कोसा करीब आठ हजार परिवारों को रोजगार दे रहा है।

पैदाइश साल जंगलों में

उपसंचालक रेशम एके श्रीवास्तव बताते हैं कि रैली कोसा सिर्फ बस्तर के साल वनों में ही पनपता है। रेशम उद्योग विभाग प्रतिवर्ष वन विभाग की मदद से जिले के साल वनों में 20 से अधिक कोसा प्रगुणन केंद्र स्थापित कर पेड़ों पर 19 से 20 लाख मादा तितलियां छोड़ता है। ये तितलियां साल वृक्षों के खुरदरे तनों में अंडे देती हैं। इसके चलते प्रतिवर्ष करीब तीन करोड़ रैली कोसा एकत्र किया जाता है। बस्तर का कोसा वस्त्र अपने विशेष रंग और गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में प्रख्यात है।

प्रतिवर्ष एक टन धागा

ग्रामोद्योग विभाग के रेशम प्रभाग द्वारा धरमपुरा में 21 साल से कोसा धागा प्रसंस्करण केंद्र संचालित है। क्षेत्रीय तसर अनुसंधान केंद्र के प्रभारी एसके विश्वकर्मा बताते हैं कि एक साबूत रैली कोसा का वजन मात्र 2.5 ग्राम होता है। कॉस्टिक सोडा में उबालने के बाद इसका वजन 1.6 ग्राम रह जाता है। उबले हुए एक रैली कोसा से 1500 से लेकर 1800 मीटर अर्थात डेढ़ किलोमीटर से भी लंबा धागा निकलता है।

इस विशेषता के कारण ही बस्तर के रैली कोसा की मांग कपड़ा उद्योग में अधिक है। धरमपुरा और कालीपुर की 40 महिलाएं प्रतिदिन रैली कोसा से मशीन से रिल्ड थ्रेड और मटकी के पेंदे में रगड़कर घिचा धागा तैयार करती हैं। प्रत्येक महिला प्रतिमाह छह हजार रुपये अतिरिक्त आय प्राप्त कर लेती हैं। इन महिलाओं ने बीते वर्ष 600 किलोग्राम घिचा और 450 किलोग्राम रिल्ड थ्रेड तैयार की थी।

बाहर जा रहा रैली कोसा

जिले में प्रतिवर्ष एक हजार 50 किग्रा कोसा धागा तो निकाला जा रहा है। कोसा खरीदी के लिए मार्केट ओपन होने के कारण यहां का अधिकांश कोसा जांजगीर, चांपा, भागलपुर और कोटपाड़ के व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं। वहीं जिला मुख्यालय स्थित कोसा सेंटर में साड़ियां भी तैयार की जाती हैं।

बस्तर का रैली कोसा हजारों को रोजगार दे रहा है। जानकारों का कहना है कि बस्तर के बेरोजगार कोसा वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण लेकर काम शुरू करें तो वे बेहतर स्थायी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, चूंकि कोसा वस्त्रों और इससे तैयार दीगर सामानों की मांग लगातार बढ़ रही है।

साल कटाई रोकें

आदिवासियों की संस्था लिफ के संस्थापक अध्यक्ष अधिवक्ता अर्जुन नाग और बस्तर प्रकृति बचाओ समिति के अध्यक्ष दशरथ कश्यप का सुझाव है कि बस्तर की विशेष उपज रैली कोसा को वनोपज घोषित कर इसका समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए। विश्व प्रसिद्ध रैनी कोसा उत्पादन को संरक्षण देना है तो वन विभाग साल वनों की कटाई पूरी तरह से रोक दे तथा प्रति वर्ष साल जंगल में अनिवार्य रूप से प्रगुणन केंद्र स्थापित कर जंगलों में जीवित कोसा तितलियां को छोड़ा जाना चाहिए।

Posted By: Hemant Upadhyay