Chhattisgarh Tribals News: अनिल मिश्रा. जगदलपुर। आदिवासियों को गैर हिदू बताने की साजिश का भाजपा ने बस्तर में विरोध शुरू कर दिया है। इसका बीड़ा पूर्व मंत्री और पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता केदार कश्यप ने उठाया है। अभियान के तहत वह लोगों को बताएंगे कि आदिवासी गैर हिंदू नही हैैं। उनकी पूजा पद्धति अलग हो सकती है, मगर देवी-देवता अलग नहीं हैैं। यही वजह है कि कश्यप ने गणेशोत्सव से इसकी शुरुआत की है और नवरात्र में भी अभियान को परवान चढ़ाएंगे। कश्यप के समर्थन में संभाग के अन्य जिलों से भी भाजपा के आदिवासी नेता उतर गए हैं।

भाजपा नेता कश्यप खुद आदिवासी समुदाय से हैं। वह इससे आहत हैं कि अन्य धर्मावलंबियों की साजिश का शिकार आदिवासी हो रहे हैं। बीते दिनों राजनांदगांव में सर्व आदिवासी समाज की ओर से एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर सार्वजनिक जगहों पर गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव के आयोजन पर रोक लगाने की मांग की गई थी। कोंडागांव में एक शिक्षक ने आदिवासी बच्चों की इसलिए पिटाई कर दी, क्योंकि उन्होंने जन्माष्टमी पर उपवास रखा था, जबकि बस्तर के आदिवासी गांवों में वर्षों से गणेशोत्‍सव का आयोजन किया जा रहा है।

कश्यप कहते हैं कि आदिवासियों की सांस्कृृतिक परंपराएं, रीति रिवाज, पूजा पद्धति विशिष्ट हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वह हिदुओं से अलग हैं। उन्होंने कहा कि देशभर में आदिवासी इलाकों में इसाई मिशनरियां सक्रिय हैं। झारखंड के आदिवासी इलाकों से मुहिम चलाई गई, जिसमें कहा गया कि आदिवासियों का धर्म हिदुओं से अलग है। उन्हें सरना धर्म का बताया गया। यह मुद्दा तूल पकड़ रहा है। भाजपा ने प्रदेश स्तर पर मतांतरण के खिलाफ भी मुहिम छेड़ दी है। कश्यप ने कहा कि दवाई, पढ़ाई का प्रलोभन देकर मतांतरण का चक्रव्यूह रचा जा रहा है जिसे सफल नहीं होने देंगे।

बस्तर में सदियों से पूजे जा रहे गणेश

दंतेवाड़ा जिले में फरसपाल के पास बैलाडीला पहाड़ पर तीन हजार फीट की ऊंचाई पर ढोलकल चट्टान पर गणेश जी की करीब एक हजार साल पुरानी मूर्ति है। आदिवासी इसकी पूजा करते आए हैं। बैलाडीला पहाड़ पर ही झिरका के पास जंगल में गणेश जी की सदियों पुरानी प्रतिमा पाई गई है। यहां जंगली जानवरों का खतरा है फिर भी गणेशोत्‍सव पर आदिवासी पूजा करने पहुंच रहे हैं। बारसूर के गणेश जी की सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमा छत्तीसगढ़ का गौरव है।

बूढ़ादेव और आंगादेव हैं रक्षक

आदिवासी परंपरा में शिवजी को बूढ़ादेव के रूप में पूजा जाता रहा है। केशकाल के पास गोबरहीन में सदियों पुराना शिवलिग है। मां दंतेश्वरी बस्तर की आराध्य देवी हैं। यहां मानसी माता, शीतला माता, हिगलाजिन माता, महादेव, आंगादेव आदि देवी देवताओं की पूजा की परंपरा रही है। बूढ़ादेव और आंगादेव को आदिवासी अपना रक्षक मानते हैं।

Posted By: Kadir Khan

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