जगदलपुर। Firing in ITBP Camp संभाग में लंबे समय से सीआरपीएफ, आइटीबीपी, बीएसएफ समेत केंद्रीय सुरक्षा बलों की करीब 35 बटालियन नक्सल मोर्चे पर तैनात हैं। जंगलों में मोर्चा लेने वाले जवान दूरस्थ राज्यों से ताल्लुक रखते हैं। परिवार से दूर रहने व अन्य मानसिक परेशानियों के चलते वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं और खुद को ही गोली मारने जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। बीते एक साल में छह जवानों ने खुदकुशी की है। ऐसे अधिकतर मामलों के लिए छुट्टी से लौटने पर कमांड ऑफिसर के व्यवहार एवं छुट्टी नहीं मिलने को कारण बताया जाता है।

बता दें कि बस्तर के दूरस्थ इलाकों में अन्य बुनियादी सुविधा समेत संचार सेवा भी नाममात्र की हैं। ऐसे में अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर तैनात यह जवान उनसे नियमित संपर्क में नहीं रह पाते। साथ ही विपरीत परिस्थितियों में ड्यूटी के चलते मानसिक रूप से दबाव में रहते हैं। दूरस्थ इलाकों में लगातार ड्यूटी, सीनियर ऑफिसर के व्यवहार के चलते वे डिप्रेशन में जाने लगते हैं। इसकी पराकाष्ठा खुदकुशी के रूप में सामने आती है। बीते एक साल में बीजापुर, दंतेवाड़ा व सुकमा जिलों में तैनात छह जवानों ने खुद को गोली मार आत्महत्या की है।

कमांड अफसरों का दुर्व्यवहार प्रमुख वजह

एक माह पूर्व ही सुकमा जिले के जगरगुंडा इलाके के सीआरपीएफ जवान ने वरिष्ठ अफसरों को एक वॉयस रिकार्ड भेजा था, जिसमे कंपनी कमांडर द्वारा उससे गाली गलौज की जा रही थी। मामले में अफसर पर जांच बिठाई गई थी। इसी प्रकार सीआरपीएफ 170 बटालियन बीजापुर जिले में तैनात आरक्षक दीपक कुमार शाह 20 जून 2019 को अपने गृह ग्राम साहिबगंज झारखंड से अवकाश से लौटा था। ज्वाइनिंग करते ही उसने सर्विस रायफल इसांस से खुद को गोली मार ली। सात जून 2016 को दंतेवाड़ा अरनपुर-कोदामारा में तैनात 231 सीआरपीएफ के डॉग हैंडलर सतीश कुमार ने भी खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली। बीजापुर पुलिस लाइन में तैनात जवान संदीप टोप्पो ने 12 जुलाई 2019 को खुद को सर्विस रायफल से शूट कर लिया था। इसी प्रकार जून 2016 में सुकमा के मरईगुड़ा कैंप में तैनात जवान तेजवीर सिंह ने खुद को गोली मार ली। उपरोक्त मामलों में वरिष्ठ अकिारियों के दुर्व्यवहार की बात साथियों ने दबे जबान में कही थी।

तमाम कवायदें नाकाम

दो साल पहले केंद्रीय सुरक्षा बलों बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी समेत अन्य बलों के जवानों में आत्महत्या की बढती प्रवृति पर नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा चिंताजनक आंकड़े जारी करने के बाद गृह विभाग ने कुछ निर्देश दिए थे। इसमें जवानों को अवसाद से बचाने उन्हें परिवार रखने की अनुमति देने, योगा व ध्यान की नियमित कक्षाएं संचालित करने, म्यूजिक थैरेपी समेत खेलकूद आदि मनोरंजक गतिवियिों समेत समय-समय पर मनोरोग विशेषज्ञों से काउंसिलिंग कराने की बात थी। उपरोक्त कवायद केवल जबानी जमा खर्च ही साबित हुई। हालांकि बल के वरिष्ठ अकिारी विभागीय तनाव जैसे कारणों से साफ इंकार करते हैं।

रूटीन में शामिल

जवानों को अवसाद से बचाने समय-समय पर योगा व खेलकूद आदि गतिवियिां कैंप में संचालित होती रहती हैं। यह रूटीन में शामिल है। बटालियन का कोई भी जवान ड्यूटी के चलते अवसादग्रस्त नहीं है। - अमिताभ कुमार सीओ सीआरपीएफ 80 बीएन

मेडिसीन व काउंसिलिंग जरूरी

पारिवारिक समेत अन्य बाह्य कारणों से अवसादग्रस्त सुरक्षा बलों के जवान सीजोफ्रेनिया से ग्रस्त हो जाते हैं। साथ ही दिमाग में डोपामाइन न्यूरो ट्रांसमीटर का असंतुलन होने लगता है। इसके चलते आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। इससे निपटने का प्राथमिक उपाय पीड़ित की पहचान करना व उसे मानसिक रूप से संबल देना है। इसके बाद दवाइयां भी दी सकती हैं। - एम गोपाल स्वामी, मनोरोग विशेषज्ञ हैदराबाद

Posted By: Prashant Pandey

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