अनिल मिश्रा, जगदलपुर। कभी जहां बारूद की गंध महसूस की जाती रही वहां अब विकास की बयार दिख रही है। सुकमा के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित इलाके की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जिले का ताड़मेटला गांव छह अप्रैल 2010 को तब चर्चा में आया था, जब यहां नक्सली हमले में 76 जवान शहीद हो गए थे। ताड़मेटला में जिस जगह यह घटना हुई थी वह दोरनापाल-जगरगुंडा स्टेट हाइवे पर है।

10 साल में बदलाव यह आया है कि फोर्स स्टेट हाइवे के अंदर जंगल में कैंप करने लगी है। इसी स्टेट हाइवे से पांच किमी अंदर दक्षिण में मिनपा गांव है। पिछले साल 23 मार्च को यहां नक्सलियों ने डीआरजी जवानों को घेरकर फायरिंग की जिसमें 17 जवान शहीद हो गए थे। शहीद जवानों के पार्थिव देह को बाहर निकालने में तब 20 घंटे लग गए थे।

यह ऐसा इलाका है, जहां से शहीदों के शवों को निकालने के लिए भी फोर्स को आपरेशन चलाना पड़ता था। दोरनापाल-जगरगुंडा सड़क को खूनी सड़क का तमगा हासिल था। ताड़मेटला के अलावा भी इस सड़क पर कई बड़ी नक्सल घटनाएं हो चुकी हैं। हालांकि अब बाजी पलट रही है। मिनपा में फोर्स ने कैंप खोल दिया है। दोरनापाल से जगरगुंडा तक पुलिस 56 किमी बम रोधी सीसी सड़क बना रही है। इस सड़क पर ताड़मेटला के पास से अंदर एक रास्ता मिनपा होते हुए किस्टारम तक जाता है। कभी इस सड़क को भी स्टेट हाइवे का दर्जा मिला था पर लाल आतंक ने सड़क पर ऐसा कहर ढाया कि वाहन तो दूर की बात है पैदल चलना भी मुहाल था।

फोर्स के साए में अब मिनपा होते हुए किस्टारम तक भी चमचमाती सड़क बन रही है। ताड़मेटला इन दो स्टेट हाइवे के जंक्शन पर है। वहां भव्य चौक का निर्माण कराया जा रहा है। मिनपा सरीखे अंदरूनी इलाकों के कैंपों के जरिए इन जंगलों में विकास की चकाचौंध दिखने लगी है। कैंपों तक पहुंची बिजली से जंगल में उजियारा फैल रहा है। सुकमा एसपी केएल ध्रुव कहते हैं कि सड़क तेजी से बन रही है। बहुत जल्द पहली बार मिनपा गांव तक बिजली भी पहुंच जाएगी। इसी के साथ नक्सलवाद के अंधकार में जीवन गुजार रहे आदिवासियों के जीवन में भी रोशनी आएगी।

शहादत ने खोला रास्ता

दोरनापाल-जगरगुंडा मार्ग पर बुर्कापाल कैंप से मिनपा की दूरी पांच किमी ही है पर घनघोर जंगल व नक्सली खतरे की वजह से ग्रामीणों को बाहर निकलने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। किसी जमाने में मिनपा होते हुए किस्टारम तक पक्की सड़क थी जिसके अवशेष अब भी दिखते हैं। टूटी-फूटी सड़क व अधूरे पुल उस जमाने के विकास के गवाह हैं। सड़क के बीच में बड़े-बड़े पेड़ उग आए और यह स्टेट हाइवे जंगल में गुम हो गया। पिछले साल मिनपा में मुठभेड़ के बाद जवानों के शव निकालने के लिए यहां कोई वाहन नहीं जा पाया। 20 घंटे की मशक्कत के बाद साथी जवानों ने उनके शरीर को कांधे पर बाहर निकाला। इसके बाद ही यह तय किया गया कि मिनपा में कैंप खोला जाएगा। नक्सली इस कैंप से बहुत परेशान हैं और लगातार हमले कर रहे हैं पर जवान डटे हुए हैं।

मिनपा तक सड़क, बिजली और विकास के सभी काम कराए जा रहे हैं। 2013 में भी वहां कैंप खोला गया था पर तब हमें पीछे हटना पड़ा था। इस बार नक्सलियों को पीछे धकेलकर वहां विकास किया जा रहा है।

- सुंदरराज पी, आइजी बस्तर

Posted By: Nai Dunia News Network

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