हेमंत कश्यप (नईदुनिया) जगदलपुर। नारायणपुर का माता मावली मेला जिसे स्थानीय बोली में मड़ई के नाम से संबाेधित किया जाता है, बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का सबसे प्रसिद्ध आयोजन है। यह अपने क्षेत्र का सबसे बड़ा लोक उत्सव है। इसमें नारायणपुर ही नहीं पूरे बस्तर संभाग से दूर-दूर से आदिवासी शामिल होते हैं। बस्तर के साथ ही देश दुनिया से भी लोग यहां पहुंचते हैं।

यह मेला प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के पहले बुधवार को भरता है। इसका पूरे साल भर आदिवासियों को उत्सुकता से इंतजार रहता हैं। आदिवासियों के लिए माता मावली मेला धार्मिक आस्था और विश्वास का केंद्र है। मावली मेला में बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आदिवासियों का समागम होता है। विलक्षण सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध आदिम समाज बाहरी दुनिया के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है। मावली मेला के दौरान विभिन्न आदिवासी संस्कृतियां एक साथ, एक सप्ताह तक एक सतरंगी छटा बिखेरती हैं।

इस मेले का इतिहास बहुत प्राचीन है। बस्तर रियासत में वर्ष 1737 ईस्वी में जब दलपत देव सत्तासीन हुए, तब उन्होंने शासन चलाने के लिए पूरे बस्तर रियासत को 18 गढ़ों में बांटा और प्रत्येक गढ़ में अपनी कुलदेवी दंतेश्वरी माता की स्थापना की। बड़ेडोंगर, छोटेडोंगर के बाद नारायणपुर तीसरा गढ़ है। यहां दंतेश्वरी माता की स्थापना गढ़गुडरा (पहाड़ी मंदिर) में किया गया था।

एक किवदंती के अनुसार एक घटना के बाद पुजारी रामचंद्र पात्र ने देवी की मूर्ति को गढ़गुडरा की एक गुफा में छुपा दिया और द्वार को इंद्रजाल मंत्र से बांध दिया। लोगों ने मूर्ति को निकालने अनेक प्रयास किए पर सफल नहीं हुए। कुछ लोग शिकार करने करेल घाट की ओर गए। जहां उन्हें वृक्ष के नीचे एक मूर्ति दिखाई दी। गांव वापस आकर पेड़ के नीचे रखी प्रतिमा की जानकारी दी।

ग्रामीणों ने देव आज्ञा लेकर गढ़पारा में मंदिर बनाकर विधि विधिवत उक्त प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की। बताया जाता है कि गया कि मूर्ति करेल घाट से लाई गई थी और वह स्थान मावली माता का होने से देवी का नाम मावली माता पड़ा और तब से इसी नाम से मेला का आयोजन किया जाना लगा।

कोकरेंग नृत्य आकर्षण

मावली मेला में आदिवासी युवक-युवतियां एक निश्चित स्थान में कोकरेंग नृत्य करते हैं। खुली जगह चांदनी रात में टोलियां बनाकर कमर में लगभग 10 से 15 किलोग्राम तक वजनी घुंघरू बांध तालबद्ध के साथ नृत्य करते हैं। इस नृत्य के दौरान गाए जाने वाले गीत को कोकरेंग पाटा (देव आराधना गीत) कहते हैं। जिसमें देव की उत्पत्ति, निवास, उसे किस गोत्र के लोग पूजते हैं? आदि का वर्णन होता है। यह नृत्य मावली मेला की एक मुख्य विशेषता है।

Posted By: Pramod Sahu

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