जगदलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

बस्तर के वनों को सहेजने का प्रयास रियासत काल से किया जा रहा है। इसके चलते ही भीतरी जंगलों में सैकड़ों वन कर्मचारी आवास व विश्रामगृह बनाए गए थे लेकिन इन आवासों में नक्सली दहशत के चलते अब कोई नहीं रहना चाहता इसलिए देखरेख के अभाव में सभी आवास तेजी से

जर्जर होने लगे हैं और वन विभाग भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।

संभागीय मुख्यालय पर 53 किलोमीटर दूर दरभा ब्लॉक के बिसपुर गांव में वन विभाग का सुंदर विश्रामगृह है। यह विश्रामगृह तीरथगढ़ वॉटरफॉल से कुछ किमी की दूरी पर ही है इसलिए यह वन संरक्षण कार्य के साथ-साथ सैलानियों के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। वर्ष 1955 में बनाए गए विश्रामगृह में कई कमरे, बरामदे, हाल, रसोईगृह, चौकीदार कक्ष के अलावा चारों तरफ सुरक्षा घेरा है। इतना सब कुछ होने के बावजूद यह विश्रामगृह पांच साल से उपेक्षित पड़ा है। बताया गया कि पांच साल पहले कुछ नक्सली बिसपुर पहुंचे थे और विश्रामगृह में ठहरे कुछ वन कर्मियों को वहां से भगा दिया था। इस घटना के बाद ही विश्रामगृह मे अब कोई वनकर्मी नहीं ठहरता जबकि ग्रामीण समयानुसार इस भवन का अपने स्तर पर उपयोग करते आ रहे हैं। इधर बिसपुर इलाके में वनों की सुरक्षा नहीं किए जाने से सैकड़ों साल वृक्षों की गर्डलिंग कर उन्हें सूखाने और वनभूमि पर कब्जा करने का कार्य बढ़ गया है। बता दें कि बिसपुर का विश्रामगृह भी माचकोट विश्रामगृह की तरह सुरक्षति और सुंदर है। विभागीय सूत्रों ने बताया कि बस्तर वनमंडल के अधिकारी ही नहीं चाहते कि बिसपुर विश्रामगृह को फिर से व्यवस्थित किया जाए। अगर ऐसा किया गया तो उन्हें विभागीय कार्य के लिए इस संवेदनशील क्षेत्र में जाना पड़ेगा। बिसपुर के ग्रामीणों ने बताया कि वन विश्रामगृह में बस्तर के जनप्रतिनिधि आकर ठहरते रहे हैं और लोगों की समस्याएं सुन उनका निवारण भी करते रहे हैं। इसके चलते कई शासकीय आयोजन भी विश्रामगृह परिसर में संपन्न होते रहे हैं लेकिन जब से इस की उपेक्षा की जा रही है, कोई सरकारी कार्यक्रम यहां नहीं हो रहे हैं। इसके साथ ही बिसपुर की रौनक भी खत्म हो गई है। बताया गया कि रियासत काल से लेकर बीते कुछ वर्षों तक सैलानी-अधिकारी कुडुमखोदरा जैसे घाटी गांव में भ्रमण और वनों की निगरानी हेतु आते रहे हैं, परन्तु अब बिसपुर विश्रामगृह एक कहानी बन कर रह गया है। इधर वन अधिकारी बिसपुर विश्रामगृह पर चर्चा करने से ही कतरा रहे है।