जगदलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

बस्तर के विभिन्न गांव में रहने वाले कुम्हारों के सामने अब आजीविका का संकट गहराने लगा है। इसके बनाए मिट्टी के सामानों की मांग तेजी से कम हो गई है वहीं सीमावर्ती उड़ीसा के उमरकोट इलाके के कुम्हार अपनी कलात्मक वस्तुओं के कारण बस्तर के बाजारों में छाने लगे हैं। वे जगदलपुर में ही प्रतिवर्ष 20 लाख से अधिक दीपक बेच जाते हैं।

बस्तर जिला के तोकापाल, बस्तर और जगदलपुर ब्लॉक में कुछ कुम्हार परिवार निवासरत हैं, जो परंपरानुसार माटी के दीपक के अलावा विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाते हैं। ये सभी दीपावली को अपने रोजगार का मुख्य सीजन मानते हैं परंतु बीते चार साल से इनकी बनाई वस्तुओं की मांग तेजी से घटी है। इस संबंध में पथरागुड़ा के सालिकराम विश्वकर्मा, मंगतीन बाई, दयाराम, शत्रुघन बताते हैं कि प्रति वर्ष उमरकोट के 300 से अधिक कुम्हार दीपक के अलावा विभिन्न कलात्मक वस्तु, टोरा तेल आदि लेकर जगदलपुर आकर बेचते हैं इसलिए इनकी सामग्री कम बिकती है। इधर उमरकोट के जगन्नाथ, रामचंद्र मुंडा, सोनाधर चक्रवर्ती, मोतीलाल साहू, बताते हैं कि उनके बनाए दीपक और अन्य सामग्री बस्तर के कलाकारों द्वारा बनाई गई सामग्री से अधिक सुंदर और सस्ते होते हैं इसलिए उमरकोटिया दीये की मांग बढ़ी है। बताया गया कि उमरकोट इलाके का दीया जगदलपुर से बीजापुर, बचेली- किरंदुल, कोंटा, सुकमा तक जा रहा है। अब तो कई दीया बनाने वाले उमरकोटिया दीया खरीदकर बेचने लगे हैं। इन सबके चलते बस्तर के कुम्हारों द्वारा बनाए गए सामानों की मांग बेहद कम हो गई है और अब इनके सामने रोजगार की समस्या खड़ी हो गई है। बता दें कि शिल्पग्राम के नाम से चर्चित नगरनार मिट्टी की कलात्मक वस्तुओं के लिए भी पूरे बस्तर में चर्चित रहा है परंतु जिस नगरनार में कभी 200 से अधिक परिवार टेराकोटा के अलावा मिट्टी की विभिन्न वस्तु बनाकर रोजगार करते थे, वहां अब पांच -छह परिवार ही इस व्यवसाय से जुड़े हैं। शेष परिवार कृषि मजदूरी या नगरनार स्टील प्लांट में ठेका मजदूर के रूप में काम करने लगे हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network