जगदलपुर(अनिल मिश्रा)। नईदुनिया

चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव के मतदान के बाद अब इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या राज्य विधानसभा में बस्तर से भाजपा का कोई विधायक नहीं होगा और बस्तर एक तरह से भाजपा मुक्त हो जाएगा या फिर पार्टी अपनी साख बचाने में कामयाब होगी। यह चर्चा इसलिए खास है क्योंकि बस्तर संभाग की 12 विधानसभा सीटों में से 11 पर कांग्रेस पहले से काबिज है। एकमात्र बची सीट चित्रकोट में भाजपा प्रतिष्ठा बचाने की लड़ाई लड़ रही है। उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा मुक्त बस्तर का नारा बुलंद कर भाजपा को चुनौती दी है वहीं भाजपा ने इस एक सीट को जीतकर इतिहास बनने से रोकने पूरी ताकत झोंक रखी थी। दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में 15 साल बाद कांग्रेस बम्फर सीटों के साथ प्रदेश की सत्ता में लौटी। तब बस्तर की दंतेवाड़ा सीट ही ऐसी थी जो भाजपा के कब्जे में आई थी। हालांकि पिछले महीने हुए उपचुनाव में भाजपा ने दंतेवाड़ा की सीट भी गंवा दी। वर्तमान में बस्तर में भाजपा का कोई विधायक नहीं है। अब पार्टी को चित्रकोट से ही उम्मीद है। बस्तर के संसदीय इतिहास में आजतक ऐसा नहीं हुआ है कि किसी एक पार्टी का पूरा कब्जा हो। ऐसा तब भी नहीं हुआ था जब केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर कांग्रेस की तूती बोलती थी। उपचुनाव में भारी मतदान के बाद राजनीतिक पंडितों के समीकरण भले ही गड़बड़ा रहे हों, कांग्रेस, भाजपा समेत सभी दल भारी मतदान को अपने पक्ष में बता रहे हैं।

दरअसल सितंबर में दंतेवाड़ा उपचुनाव में भाजपा के जीत की ज्यादा उम्मीद की जा रही थी। भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद हो रहे उपचुनाव में उनकी पत्नी भाजपा प्रत्याशी ओजस्वी मंडावी के पक्ष में सहानुभूति लहर की संभावना व्यक्त की जा रही थी। 2018 में कांग्रेस की लहर के बावजूद दंतेवाड़ा में भाजपा विजयी रही थी। इस बार तो पार्टी नेता जीत की गांरटी कर रहे थे। लेकिन नतीजे 10 हजार मतों के भारी अंतर से कांग्रेस के पक्ष में चले गए। इसके बाद पार्टी ने चित्रकोट में बदला लेने की बात कही और यहां माहौल बनाने की भरपूर कोशिश भी की। हालांकि जमीन पर कार्यकर्ताओं में वैसा उत्साह कम ही नजर आया। दूसरी ओर सत्ता में आने के बाद चित्रकोट विधानसभा क्षेत्र में टाटा के लिए अधिग्रहित भूमि लौटाकर कांग्रेस यहां अपनी जमीन पहले से मजबूत करने में लगी रही। प्रचार के दौरान टाटा की जमीन को सभी दलों ने मुद्दा बनाया। भाजपा कहती रही कि अगर चौथी बार सत्ता में आते तो जमीन तो हम भी लौटा देते, सीपीआई टाटा के खिलाफ असली लड़ाई लड़ने का दावा करती रही और जोगी जमीन वापसी को बस्तर के औद्योगिकरण के लिए बड़ा झटका बताते रहे। अब जमीन पर कौन होगा और किसकी जमीन खिसकेगी यह तो नतीजों से ही तय होगा। विजय का दावा तो सभी कर रहे हैं पर भाजपा के लिए यह लड़ाई सीट जीतने से ज्यादा बड़ी है।

Posted By: Nai Dunia News Network