अनिल मिश्रा, जगदलपुर। Jagdalpur Naxal Crime : लाल आंतक की वजह से चर्चित दंडकारण्य इलाके में नक्सलियों के पास ओडिशा और आंध्रप्रदेश के रास्ते गोला-बारूद पहुंच रहा है। पुलिस के पास पुख्ता सबूत नहीं हैं पर पुलिस अफसरों को संदेह है कि नक्सलियों के तार पाकिस्तानी आतंकवादियों से भी जुड़े हैं। दंडकारण्य को आधार इलाका बनाकर सत्ता परिवर्तन का स्वप्न देख रहे नक्सली लगातार अपनी तकनीक उन्न्त कर रहे हैं।

हाल के दिनों में दंतेवाड़ा में फोर्स ने रिमोट आधारित लैंडमाइन बरामद की थी। इससे पहले भी उनके पास से अति आधुनिक हथियार मिल चुके हैं। अभी कुछ दिनों पहले कांकेर पुलिस ने नक्सलियों के 11 सप्लायरों को गिरफ्तार किया है। इससे पहले भी कई बार नक्सलियों के शहरी नेटवर्क से जुड़े आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

हालांकि उच्चाधिकारियों की मानें तो हथियारों के मामले में उनकी मुख्य ताकत मुठभेड़ के बाद जवानों से लूटे हथियार ही हैं। दो दिन पहले राजनांदगांव जिले में हुई एक मुठभेड़ के बाद पुलिस ने एक एके 47 रायफल बरामद की। यह रायफल 2013 में बस्तर के झीरम हमले में मारे गए कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के बॉडीगार्ड की थी।

2010 में सुकमा जिले के ताड़मेटला में नक्सलियों ने अब तक का सबसे बड़ा हमला किया था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। तब नक्सलियों ने जवानों से लूटे 80 हथियारों की प्रदर्शनी मीडिया के सामने लगाई थी। हमले में सफल होने के बाद नक्सली हमेशा जवानों के हथियार लूटने की फिराक में रहते हैं।

फिर भी यह लाजिमी है कि बस्तर और समूचे दंडकारण्य में जितनी नक्सली घटनाएं हो रही हैं उसके लिए उन्हें बाहर से हथियार की जरूरत पड़ती है। सुरक्षाबलों का अनुमान है कि देश में नक्सल संगठन का सालाना बजट करीब ढाई हजार करोड़ रूपये है। इसमें से दो सौ करोड़ सालाना वे हथियारों की खरीद में व्यय करते हैं। नक्सली यह रकम अपने इलाकों में तेंदूपत्ता की लेवी, ठेकेदारों और अन्य व्यापारियों से वसूली, गांजे की खेती तथा आम जनता पर लगाए टैक्स से जुटाते हैं।

पकड़ा जा चुका है शहरी नेटवर्क का बड़ा नायक

2018 में फोर्स ने अभय देवदास नायक नाम के आरोपित को पकड़ा। नायक कई देशों की यात्रा कर चुका है। उस पर नक्सलियों के शहरी नेटवर्क का सदस्य होने का आरोप है। उससे पूछताछ में पता चला कि 2011 में नक्सल नेता किशनजी की मौत से पहले नक्सल संगठन नियमित तौर पर विदेशों से हथियारों की खरीदी करता रहा था।

श्रीलंका के लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) और असम के यूनाईटेड लिबरेटेड फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) से नक्सलियों के तार जुड़े रहे। लिट्टे ने बस्तर के नक्सलियों को लैंडमाइंस की ट्रेनिंग भी दी थी। लिट्टे और उल्फा ने एके 47, इंसास रायफल, एम 15 रायफल जैसे हथियारों की सप्लाई की। पूर्वोतर राज्यों से बंगाल फिर वहां से ओडिशा और आंध्रप्रदेश के जंगली रास्तों से सप्लाई बस्तर तक आती रही है।

देसी बारूद, विदेशी हथियार

2005 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले के हिरोली में स्थित एनएमडीसी की माइंस से 20 टन बारूद लूट लिया था। इसका इस्तेमाल वह कई साल तक करते रहे। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें गिट्टी खदानों के लिए रायपुर की ओर से आ रहा बारूद रास्ते से ही गायब हो गया। शनिवार को सुकमा पुलिस ने लेथ मशीन समेत देसी बंदूक बनाने का काफी साजो-सामान बरामद किया।

नक्सलियों को विदेश से भी मदद मिल रही है। नेपाल के नक्सलियों के अलावा उनका नेटवर्क दूसरे देशों मेें भी है। 2005 में बलरामपुर जिले में पाकिस्तान में बनी एके 47 की गोलियां मिली थीं। 2 मई 2018 को सुकमा जिले में जर्मनी की गन मिली थी। जुलाई 2017 में नारायणपुर जिले में अमेरिका की बनी सब मशीनगन मिली थी। 2014 में नारायणपुर में अमेरिका की बनी दो 7.65 एमएम पिस्टल मिल चुकी है। कई बार नक्सलियों के पास से चीन निर्मित जीपीएस सिस्टम और दूरबीन मिल चुकी है।

नक्सलियों ने ओडिशा के कोरापुट में शस्त्रागार लूटा था। गीदम और दूसरी जगहों पर भी फोर्स के हथियार बड़ी संख्या में लूट चुके हैं। ज्यादातर हथियार तो सुरक्षाबलों से ही लूटा है पर उनके संबंध लिट्टे, उल्फा और अन्य आतंकी संगठनों से भी हैं। हालांकि विदेशी कनेक्शन की और जांच की जरूरत है। अभी हम पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कह सकते। - सुंदरराज पी, आइजी, बस्तर

Posted By: Himanshu Sharma

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