हेमंत कश्यप, जगदलपुर। Jagdalpur News : छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वन भैंसा को राजपशु, पहाड़ी मैना को राजपक्षी, साल वृक्ष को राजवृक्ष का दर्जा दिया गया है परंतु अब तक किसी मछली को राज मछली का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। बस्तर की इंद्रावती नदी में पाई जाने वाली तथा तेजी से खत्म हो रही बोध मछली को राज मछली का दर्जा देकर इसे संरक्षित किया जाना जरूरी है।

कैटफिश को ही बस्तर में बोध या गुंज मछली कहा जाता है। छोटी को बोध और गुंज तथा बड़ी को भैसा बोध कहा जाता है। यह मछली भारत में ब्रह्मपुत्र नदी के अलावा राज्य की इंद्रावती, शबरी व लीलागर नदी में पाई जाती थी। ब्रह्मपुत्र में यह मछली अभी भी पनप रही है लेकिन शबरी नदी में अब यह नजर नहीं आती।

फिलहाल इंद्रावती नदी में ही बची है। इंद्रावती में यह मछली चित्रकोट वाटरफॉल के नीचे से लेकर गोदावरी संगम के मध्य पाई जाती है। इस मछली का वजन 150 किलो तक होता है। यह मांसाहारी मछली है और नदी में बह कर आए मृत जीवों को खाती है।

पूजनीय है बोध मछली

बोध मछली को बस्तरवासी सम्मान देते हैं। इसके नाम पर ही बारसूर के पास बोध नामक गांव है। लंबित पनबिजली परियोजना का नाम भी बोधघाट रखा गया है। जगदलपुर शहर की एक कॉलोनी और थाना का नाम बोध मछली के नाम पर क्रमशः बोधघाट कॉलोनी और बोधघाट थाना हैं।

यह मछली आक्रामक होती है और भूखी होने पर कभी कभी नदी में उतरे व्यक्ति पर हमला कर देती है, इसलिए जान माल की सुरक्षा के हिसाब से इंद्रावती नदी किनारे बसे दर्जनों गांवों के रहवासी बोध मछली की पूजा करते हैं। बोध मछली के नाम पर चित्रकोट जलप्रपात के पास एक खोह में सैकड़ों वर्ष पुराना बोध मंदिर है। यहां कूड़क जाति के मछुआरे प्रतिवर्ष जात्रा आयोजित कर बोध मछली की पूजा करते हैं।

जमकर हो रहा शिकार

यह मछली बारसूर इलाके में अधिक पाई जाती है। एक तरफ बोध मछली देवी तुल्य होने तथा इसका मांस गौ मांस की तरह ही दिखता है, इसलिए बस्तर के अधिकांश रहवासी इस मछली को नहीं खाते परंतु बेचने के लिए नदी से पकड़ते जरुर हैं।

चित्रकोट, बारसूर, बिंता घाटी, मुचनार, भैरमगढ़ आदि इलाके में इस मछली का जमकर शिकार होता है। बारसूर, लोहंडीगुड़ा, मारडूम, जगदलपुर, गीदम बाजारों में यह बेचने के लिए लाई जाती है। उत्तर बस्तर के पखांजूर, कापसी के बाजारों में बोध मछली की जमकर बिक्री होती है। पखांजूर इलाके में इस मछली का मांस 500 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। पखांजूर क्षेत्र में बढ़ी मांग के चलते ही बोध मछली का शिकार तेजी से बढ़ा है, इसलिए यह इंद्रावती नदी में कम होने लगी है।

बोध को संरक्षित करना जरूरी

प्रदेश सरकार ने विभिन्न विशेषताओं और दुर्लभता के आधार पर ही साल, पहाड़ी मैना, वनभैंसा को क्रमशः राजवृक्ष, राजपक्षी और राजपशु का दर्जा दिया है। बोध मछली की संकटग्रस्त स्थिति को देखते हुए इसे संरक्षित करना बेहद जरूरी है। बोध मछली को बचाने का बेहतर तरीका यह है कि इंद्रावती में पाई जाने वाली इस मछली को राज्य मछली का दर्जा देकर इसके संरक्षण व संवर्धन की विशेष योजना बनाई जाए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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