विनोद सिंह, जगदलपुर नईदुनिया। बस्तर ब्लॉक के बालेंगा पंचायत की आदिवासी महिलाएं सफलता की नई इबारत लिख रही हैं। उनके लिए वो दौर खत्म हो चुका है, जब कौड़ी-कौड़ी को मोहताज होना पड़ता था। सच्ची लगन और कठिन परिश्रम की बदौलत उन्होंने आज बालेंगा को कुटीर उद्योग का हब बना दिया है। विभिन्न् समूहों से जुड़ीं यहां की हजार से अधिक महिलाएं साबुन, सर्फ, सेनेटरी नेपकिन, दोना-पत्तल और काजू प्रसंस्करण केंद्र का संचालन कर हर माह हजारों रुपया कमा रही हैं। इतना ही नहीं, सैकड़ों महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं। स्कूल का मुंह तक नहीं देख पाने वाली ये महिलाएं आज बच्चों को स्कूल भेजने के साथ ही उनकी बेहतर परवरिश भी कर रही हैं।

बना रहे साबुन-नेपकिन, चला रहे काजू प्रसंस्करण केंद्र बालेंगा में शकुंलता निषाद के नेतृत्व में महिला समूह साबुन बनाने का काम कर रहा है। समूह की नेहा, संगीता, रेवती और निर्मला आदि ने बताया कि वे एक साल से साबुन बना रही हैं। इसके लिए उन्होंने प्रशिक्षण लिया है। उन्होंने बताया कि तैयार साबुन को वे ग्रामीण क्षेत्र की किराना दुकानों में बेचती हैं। इससे समूह की सभी महिला हर माह ठीक-ठाक कमाई कर लेती है। इसी तरह करंदोला भानपुरी में सृष्टि महिला समूह ने सेनेटरी नेपकिन बनाने का काम शुरू किया है।

समूह की अध्यक्ष लक्ष्मी ने बताया कि एक पैकेट नेपकिन तैयार करने में 18 रुपये की लागत आती है। इसे दुकानों में थोक में 25 रुपये में बेचती हैं। दुकानदार 35 रुपये में बेचता है। हर माह एक लाख रुपये से अधिक का कारोबार करते हैं। करमरी पंचायत में जय मां जगदंबा महिला समूह काजू प्रसंस्करण केंद्र चलाता है।

अध्यक्ष रुक्मणी ने बताया कि कच्चा माल के रूप में काजू फल सीजन में खरीदकर पूरे साल काजू से बीज निकालकर पैकेट तैयार कर बाजार में पहुंचा दिया जाता है। समूह की इन महिलाओं से ही प्रेरित होकर आज बस्तर ब्लॉक में स्टार्टअप ग्रामीण उद्यमिता कार्यक्रम बिहान के अंतर्गत करीब 1800 महिला स्व सहायता समूह गठित किए गए हैं, जिनसे हजारों महिलाएं जुड़ी हुई हैं। समूह की कई महिलाएं किराना दुकान, मनिहारी दुकान, होटल, चिकन सेंटर आदि रोजगारमूलक कामों से भी जुड़ी हैं।

अब नहीं फैलाना पड़ता किसी के सामने हाथ

ग्राम नारायणपाल में सर्फ तैयार करने वाले सूरज महिला समूह की अध्यक्ष खूबवती बाई ने बताया कि सर्फ के कारोबार से इतनी आय हो जाती है कि समूह की महिलाओं को अब किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। समूह की रुक्मणी, लक्ष्मी, मालती आदि ने बताया कि पहले उनके पास मजदूरी करने के सिवाय और कोई काम नहीं था।

परिवार चलाने के लिए आए दिन किसी न किसी से उधार लेना पड़ता था। आज उनका खुद का कारोबार है। आज तो दूसरों को भी रोजगार देती हैं। उन्होंने बताया कि पहले परिवार के पुरुष सदस्यों पर पूरी तरह निर्भर थीं। आज जब खुद आमदनी कर रही हैं तो उनका आत्मविश्वास बढ़ गया है। परिवार के सदस्य भी इससे खुश हैं।