हेमंत कश्यप/जगदलपुर। भारत में 75 साल पहले ही चीता का अस्तित्व खत्म हो चुका है। अब अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण के तहत 75 साल बाद अफ्रीकी देश नाइजीरिया से कुछ चीते भारत लाए गए हैं। अब इन्हें मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में विचरण के लिए छोड़ा जाएगा। देशवासियों को भारत भूमि में फिर से चीता के विचरण करने की खुशी है।

चीतों से जुड़ा एक ऐसा वाकया बताने जा रहे हैं जो शायद ही किसी को पता होगा और इसका संबंध छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर से है। दरअसल, 75 साल पहले कोरिया जंगल में मारे गए भारत के अंतिम चीते का सिर बस्तर राजमहल के दरबार हाल में आज भी मौजूद है। वर्ष 1947 में भारत के अंतिम तीन चीतों का शिकार कोरिया महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने बैकुंठपुर के सलका जंगल में किया था। उन्होंने एक चीता का सिर बस्तर महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भेंट किया था।

रणथंभौर फाउंडेशन चाणक्यपुरी नई दिल्ली द्वारा वर्ष 1997 में संकटग्रस्त वन्य जीवों पर विशेष अंक प्रकाशित किया गया था, जिसमें "भारत में विलुप्त एक शालीन जीव- चीता" विशेष आलेख भी प्रकाशित है। उल्लेख किया गया है कि देश के आखिरी चीते मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा में देखे अथवा मारे गए थे।

आखिरी तीन चीते कोरिया (मध्यप्रदेश) में सन 1947 में मारे गए थे। वर्ष के आखिरी दिनों की एक रात अचानक उस इलाके के महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव की गाड़ी के सामने पड़ गए थे। उन्होंने दो गोलियों से ही तीनों को ढेर कर दिया था। तीनों नर थे और संभवतः एक ही ब्यापी मां के थे।

बताया गया कि उन दिनों भी शिकार में मारे गए वन्यजीवों के पुतले बेंगलुरु में बनाए जाते थे। सलका जंगल में मारे गए चीतों का सिर और खाल कोरिया महाराजा ने बेंगलुरु भिजवाया था। चीतों के दो पुतले कोरिया पैलेस में रखे गए। बस्तर महाराज कमलचंद भंजदेव और सुकमा जमींदारी के कुमार जयदेव बताते हैं कि कोरिया महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने चीता का तीसरा पुतला 1948 में तत्कालीन महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भेंट किया था।

बस्तर से कोरिया राजपरिवार का संबंध वर्षों पुराना है। 75 साल पुराने चीता का सिर आज भी जगदलपुर राजमहल के दरबार हाल में प्रवीरचंद भंजदेव की तस्वीर के ठीक ऊपर दीवार में टंगा है। भारत में चीता का सफाया 1947 में हो चुका है। आमतौर पर लोग तेंदुआ (लेपर्ड) को ही चितवा (पेंथर) या बुंदिया बाघ कहते हैं।

बस्तर और कोरिया महाराजा में समानता

कोरिया नरेश रामानुज प्रताप सिंहदेव का जन्म वर्ष 1901 में हुआ और 1909 को मात्र नौ वर्ष की अल्पायु में राजा बनाया गया। 16 साल बाद वर्ष 1925 को बालिग होने पर सत्ता का पूर्ण अधिकार मिला। इसी तरह 25 जून 1929 को जन्मे बस्तर महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव का छह वर्ष की उम्र 1921 में राजतिलक किया गया था।

प्रवीरचंद जब 18 वर्ष के हुए, तब जुलाई सन 1947 में ब्रिटिश शासन ने उन्हें बस्तर रियासत का पूर्ण अधिकार सौंपा था। कोरिया महाराजा ने 15 दिसंबर 1947 को तथा बस्तर महाराजा ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के समक्ष एक जनवरी 1948 को विलय पत्र में हस्ताक्षर अपनी विरासत का भारत गणराज्य में कराया था।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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