Bastar Dussehra 2021: हेमंत कश्यप, जगदलपुर। बस्तर दशहरा पूजा विधान के तहत नवरात्रि की अष्टमी की मध्य रात्रि निशा जात्रा मंदिर में तांत्रिक-मांत्रियों द्वारा मां खमेश्वरी की पूजा कर बारह बकरों की बलि देने का विधान है। इसके लिए 12 गांवों के राउत माता के लिए भोग प्रसाद तैयार करते हैं। यह पूजा विधान बस्तर की खुशहाली के लिए नगर में लगभग दो सौ वर्षों से प्रति वर्ष किया जा रहा है।

बस्तर दशहरा के विभिन्ना रस्मों में निशा जात्रा का विशेष महत्व है। इस विधान के तहत मध्य रात्रि में राज परिवार के सदस्य महुआ तेल से प्रज्वलित विशेष मशाल की रोशनी में अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा मंदिर पहुंचते हैं और लगभग एक घंटे तक तांत्रिक पूजा करते हैं। इस दौरान वधिकों द्वारा बारह बकरों की बलि दी जाती है। इनके सिरों को क्रमबद्ध रख दीप जलाया जाता है, साथ ही मिट्टी के बारह पात्रों में रक्त भर कर तांत्रिक पूजा अर्चना की जाती है।

दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी उदयचंद्र पाणिग्राही बताते हैं कि दुर्गा अष्टमी की रात्रि 12 बजे निशा जात्रा होती है। पहले यहां एक भैंसा की बलि दी जाती थी। अब 12 बकरों की बलि दी जाती है। इसमें बस्तर राजपरिवार के सदस्य उपस्थित रहते हैं। बस्तर दशहरा के दौरान तांत्रिक और सात्विक दोनों तरह की पूजा होती है। इसी दिन राजमहल के सिंहद्वार और मावली माता मंदिर में भी पूजा-अर्चना पश्चात दो बकरों की बलि दी जाती है।

खंडित प्रतिमा की पूजा

निशा जात्रा मंदिर का निर्माण काकतीय चालुक्य वंश के राजा रूद्रप्रताप देव द्वारा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में किया गया था। टेंपल इस्टेट कमेटी द्वारा इस गुड़ी का जीर्णोद्धार किया गया। गुड़ी में स्थापित मां खमेश्वरी प्रतिमा को शरारती तत्वों ने तोड़ दिया है। टेंपल इस्टेट कमेटी अपने 22 मंदिरों का क्रमबद्ध विकास कर रही है परंतु गत छहः वर्षों से मांग के बावजूद निशा जात्रा गुड़ी में नई प्रतिमा लगाने के प्रति टेंपल स्टेट कमेटी और खमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करने वाला राज परिवार पूरी तरह से उदासीन है।

नहीं खाते प्रसाद

निशा जात्रा पूजा विधान के लिए भोग प्रसाद तैयार करने का जिम्मा राजूर, छिटकागुड़ा, एरंडवाल, मुसलीगुड़ा, उडुवा, नैनपुर, रायकोट, आरापुर, चालकीगुड़ा, सिंघनपुर, चोकर, और धर्माऊर के रावतों को दिया गया है। इनके द्वारा तैयार भोग प्रसाद करीब दो सौ साल से माता खमेश्वरी को अर्पित किया जा रहा है। तांत्रिक पूजा होने के कारण यहां का प्रसाद कोई व्यक्ति ग्रहण नहीं करता, इसलिए हंडियों में लाए गए प्रसाद को दूसरे दिन गायों को खिला दिया जाता है। मावली मंदिर के भोगसार में तैयार किया गया प्रसाद 12 कांवड़ों में रख निशा जात्रा गुड़ी पहुंचाया जाता है।

कौन हैं मां खमेश्वरी

निशा जात्रा में खमेश्वरी के नाम से जिस देवी की पूजा होती है उनका पौराणिक नाम छिन्नामस्ता है। इस देवी ने अपने भक्तों की प्यास बुझाने के लिए अपना सिर धड़ से अलग कर तथा अपना रक्त पिलाकर भक्तों को तृप्त किया था। इस अवधारणा के चलते ही बस्तर के रहवासियों की तृप्ति और शांति के लिए प्रतिवर्ष निशा जात्रा गुड़ी में 12 बकरों की बलि देकर तांत्रिक पूजा संपन्ना की जाती है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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