जगदलपुर। जगत के स्वामी भगवान जगन्नााथ का महापर्व श्रीगोंचा नगर में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। शुक्रवार को तीन रथों में विराजित होकर भगवान जगन्नााथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ नगर परिक्रमा कर अपने भक्तों का दुख दर्द जाना। रिमझिम बारिश के बीच रथ खींचने को लेकर भक्तों में काफी उत्साह था। रथयात्रा को बस्तर में गोंचा तिहार कहा जाता है। यहां त्यौहार विगत 615 वर्षों से बस्तर में मनाया जा रहा है।

श्रीगोंचा महोत्सव की परंपरा के अनुसार बस्तर महाराजा कमलचंद भंजदेव शाम पांच बजे भगवान जगन्नााथ मंदिर पहुंचे। रथयात्रा प्रारंभ होने के ठीक पहले उन्होंने रथों के सामने चांदी के झाड़ू से रथमार्ग बुहारा की रस्म पूरी की। तत्पश्चात ताल ध्वज, नंदीघोष और देव दलन नामक रथों की परिक्रमा की। इस मौके पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य राजगुरु अरुण ठाकुर तथा टेंपल कमेटी के पदाधिकारी मौजूद रहे। भगवान के 22 विग्रहों को रथों में विराजित करने के बाद अरण्यक ब्राह्मण समाज के युवकों द्वारा रथ खींचा गया।

इस अवसर पर महापौर सफीरा साहू, शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष राजीव शर्मा, भाजपा प्रदेश महामंत्री किरणदेव, योगेंद्र पांडे, 360 अरण्यक ब्राम्हण समाज के अध्यक्ष ईश्वर खंबारी, गोंचा समिति के अध्यक्ष दीनदयाल जोशी, हेमंत पांडे, बालकराम जोशी आदि अनेक प्रमुखजन मौजूद थे। रथ जगन्नााथ मंदिर से गोल बाजार चौक, मिताली चौक, पैलेस रोड, दंतेश्वरी मंदिर के सामने से होकर देर शाम जनकपुर (सिरहासार) पहुंचा। जनकपुरी भगवान के मौसी का घर माना जाता है। भगवान जगन्नााथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र नौ दिन यहीं ठहरेंगे।

बस्तर में कैसे हुई शुरुआत

वर्ष 1405 के आसपास बस्तर महाराजा पुरुषोत्तम देव को पुरी में रथपति की उपाधि के साथ 16 पहियों वाला रथ भेंट किया गया था। उन दिनों 16 पहियों वाले विशाल रथ को बस्तर के किसी भी हिस्से में खींचना मुश्किल था इसलिए भगवान जगन्नााथ के लिए चार पहियों का तथा बस्तर दशहरा के लिए चार पहियों वाला फूल रथ तथा आठ पहियों वाला विजय रथ बनाकर तीन हिस्सों में बांटा गया। इन तीनो रथों को खीचने की परंपरा आज भी जारी है। कालांतर में पुरी की तरह शहर में भी तीन रथों का संचलन किया जा रहा है।

132 साल बाद विराजी माता लक्ष्‌मी

सिरहासार चौक के समीप भगवान जगन्नााथ मंदिर में चार गर्भगृह हैं। जिन्हें बड़े गुड़ी, कालिकानाथ, मरेठानाथ, अमात्य जगन्नााथ गुड़ी जाता है। मंदिर परिसर में भगवान राम का मंदिर भी है लेकिन माता लक्ष्‌मी का मंदिर अब तक यहां नहीं था। अरण्यक ब्राह्मण समाज की पहल पर गोंचा के अवसर पर मां अन्नापूर्णा महालक्ष्‌मी का मंदिर निर्माण पूर्ण कर गुरुवार को माता की आकर्षक प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई है। मूर्ति शहर के युवा व्यवसाई राजीव नारंग परिवार द्वारा भेंट की गई है।

पुरी की तरह महाप्रसाद

वर्ष 1890 में जगदलपुर में भगवान जगन्नााथ के मंदिर का निर्माण होने के बाद गोंचा उत्सव 135 वर्षों से जगदलपुर शहर में पूरी निष्ठा के साथ मनाया जा रहा है। भगवान जगन्नााथ की पूजा अर्चना पूरे विधि विधान से होती रही है किंतु महाप्रसाद का वितरण नहीं हो पा रहा था। अरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष ईश्वर खंबारी की पहल पर इस वर्ष महाप्रसाद का वितरण ताड़ पत्तों से तैयार बक्से में किया जा रहा है।

जमकर चली तुपकी

बस्तर का पारंपरिक गोंचा तुपकी के लिए भी प्रसिद्ध है। बांस से तैयार इस खेलवस्तु में पेंगू मालकांगिनी के कच्चे बीज का उपयोग किया जाता है। बच्चे से लेकर बड़े तक उत्साह से गोंचा के दिन तुपकी चला भगवान जगन्नााथ के नगर भ्रमण का स्वागत करते हैं। श्रीगोंचा के अवसर पर शुक्रवार को पूरा नगर तुपकी की आवाज से गूंजायमान रहा। लोग 50 रूपये से लेकर विभिन्ना रंगों वाली तुपकी डेढ़ सौ रुपए तक में खरीदते देखे गए। गोंचा महोत्सव के दौरान किसी भी प्रकार की अप्रिय वारदात न हो और महापर्व अनुशासित तरीके से सम्पन्ना हो इसलिए जिला पुलिस द्वारा सिरहासार चौक से लेकर पूरे गोलबाजार परिसर में 200 से अधिक जवानों की तैनाती की गई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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