जगदलपुर। शारदीय नवरात्र सप्तमी के अवसर पर रविवार दोपहर शहर से लगे ग्राम सरगीपाल में बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव तथा बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष सांसद दीपक बैज के सानिध्य में बेल वृक्ष की विधिवत पूजा अर्चना कर समाज को अपनी कीमती वन औषधियों को बचाने का संदेश दिया गया। इस मौके पर देवी स्वरूपा जोड़ा बेल (दो फल) तोड़कर मां दंतेश्वरी मंदिर लाया गया।

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी परंपराओं और पूजा विधाओं के माध्यम से समाज को कई प्रेरक संदेश देता आ रहा है। 75 दिनों में इस महोत्सव की विभिन्न रस्में संपन्न होती हैं। इसी तारतम्य में रविवार दोपहर शहर से चार किमी दूर ग्राम सरगीपाल के जूनापारा निवासी महादेव गदबा के आंगन वर्षों से खड़े बेल वृक्ष की पूजा अर्चना की गई। माना जाता है कि यहीं पर देवियों ने तत्कालीन बस्तर महाराजा को दर्शन दिया था। इस पूजा विधान को बेलजात्रा कहा जाता है।

इस मौके पर बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष सांसद दीपक बैज ने कहा कि बस्तर दशहरा की परंपराएं यहां के जनमानस से जुड़ी हुई हैं इसलिए इस महापर्व को सहकारिता का सबसे बड़ा उदाहरण भी माना जाता है। इस महापर्व को मनाने 20 हजार से ज्यादा लोगों की प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से भागीदारी रहती है। बेल पूजा इन्हीं पूजा विधानो में एक है। बेल फलों को मां दंतेश्वरी मंदिर तक पहुंचा कर हम बस्तर की बेशकीमती वनौषधियों को बचाने और संरक्षित करने का संदेश जन सामान्य को देना चाहते हैं।

देवी लक्ष्मी और सरस्वती का प्रतीक मानते हैं बेल फल को

दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी बताते हैं कि नवरात्र सप्तमी के दिन बेल पूजा का विशेष महत्व है। बेल फलों को देवी लक्ष्मी व सरस्वती का प्रतीक मानकर दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है। यह परंपरा वर्षों से जारी है इसलिए पूजा विधान के अनुरूप राज परिवार के सदस्य ही सरगीपाल स्थित नियत बेल वृक्ष से जोड़ा बेल फलों को तोड़ कर दंतेश्वरी मंदिर लाते हैं। बेल पूजा विधान के तहत यह निहित है कि बेल वृक्ष का पंचाग औषधीय है। पूजा से लोगों को कीमती वन औषधियों को बचाने का संदेश दिया जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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