हेमंत कश्यप, जगदलपुर (नईदुनिया)। दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी शक्तिपीठ देश-विदेश में स्थापित 51 शक्तिपीठों में शामिल है। माता सती का दांत यहां गिरा था इसलिए यह पावन स्थल दंतेश्वरी शक्तिपीठ कहलाता है। यहां वर्ष में दो नहीं अपितु तीन नवरात्र मनाई जाती है। तीसरी नवरात्र फागुन महीने में पूरे दस दिन आदिवासी समाज मनाता है।

दंतेश्वरी धाम देश का एक मात्र ऐसा शक्तिपीठ है जो दो नदियों डंकिनी-शंखिनी के संगम तट पर है। मंदिर के ठीक सामने गरूड़ स्तंभ है। अब यहां मध्य भारत का सबसे बड़ा ज्योति कलश भवन बनाया जा रहा है। दंतेश्वरी शक्तिपीठ हजारों साल पुराना है और वर्तमान में केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। इस शक्तिपीठ का 705 साल पहले वारंगल से आए चालुक्य नरेश अन्नमदेव ने जीर्णोद्धार कराया था।

वर्ष 1913 में बस्तर महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी ने दूसरी बार तथा अब केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा तीसरी बार शक्तिपीठ का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। जगदलपुर में हाेने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में मां दंतेश्वरी और मनिकेश्वरी ही मुख्य अतिथि होती हैं। मां दंतेश्वरी का छत्र ही 24 फीट ऊंचे विशाल रथ में विराजित किया जाता है।

पौराणिक कथानुसार माता सती का दांत डंकिनी और शंखिनी नदी के संगम पर गिरा इसलिए स्थल दंतेश्वरी शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है। दंतेश्वरी शक्तिपीठ की गिनती विख्यात 51 शक्तिपीठों में होती है। कुछ लोग इस मान्यता को नकारते हैं इसलिए गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित शक्तिपीठ दर्शन के पृष्ठ क्रमांक 37 पर 51 वें शक्तिपीठ के संदर्भ में लिखा गया है कि इस शक्तिपीठ को पंचसागर शक्तिपीठ नाम दिया गया है। किताब में यह भी लिखा गया है कि पंचसागर शक्तिपीठ में देवी देह के अधोदंत (नीचे के दांत) गिरे थे इसलिए वह स्थल दंतेवाड़ा माना जाता है।

शक्तिपीठ में प्रतिष्ठित मां दंतेश्वरी की मूर्ति जिस शिला में उकेरी गई है। उसके ठीक ऊपर नरसिंह भगवान की भी आकृति है इसलिए शक्तिपीठ के ठीक सामने गरुड़ स्तंभ स्थापित किया गया है। भगवान नरसिंह विष्णु अवतार हैं इसलिए प्रति वर्ष दीपावली के दिन मां दंतेश्वरी की माता लक्ष्मी के रूप में विशेष पूजा होती है।

आठ भैरवों का निवास

धार्मिक मान्यता के अनुसार शक्तिपीठों में माता दर्शन पश्चात भैरव दर्शन अनिवार्य माना गया है। डंकिनी और शंकिनी नदी पर स्थित मां दंतेश्वरी शक्तिपीठ प्रक्षेत्र को आठ भैरव भाईयों का निवास स्थल माना जाता है। इनके नाम लिंगा भैरव, वन भैरव, जटा भैरव, चीना भैरव, मटकुल भैरव, टुंडाल भैरव, पाट भैरव और घाट भैरव है। इनमें कुछ भैरव प्रतिमाओं की चोरी हो गई है।

अन्नमदेव ने कराया जीर्णोद्धार

सन 1313 ईस्वी में प्रतापरूद्रदेव का अनुज अन्नमदेव वारंगल छोड़कर बीजापुर होते हुए बारसूर पहुंचा था। उसने अंतिम नागवंशी नरेश हरिशचंद्र देव को पराजित कर वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी दिन बुधवार सन 1314 में सिहासनारूढ़ हुआ था। कुछ समय पश्चत उसकी राजधानी दंतेवाड़ा स्थानांतरित हुई थी। बारसूर से दंतेश्वरी देवी की मूर्ति लाकर दंतेवाड़ा में स्थापित की थी और अपनी इष्ट देवी के लिए शंखिनी और डंकिनी नदी के संगम पर स्थित एक जर्जर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

दंतेश्वरी शक्तिपीठ में तीन शिलालेख और 56 प्रतिमाएं मौजूद हैं। एक शिलालेख में इस बात का उल्लेख है कि वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल का राजा दंतेवाड़ा पहुंच दंतेश्वरी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। भृगु संहिता में इस बात का उल्लेख है कि यक्षिणी डाकिनी और शाकिनी के नाम पर ही इन नदियों का नामकरण डंकनी और शंखनी है। जो व्यक्ति इन नदियों के संगम में स्नान करता है। उसे प्रेत आदि बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस मान्यता के चलते ही दंतेश्वरी शक्तिपीठ पहुंचने वाले श्रद्धालु संगम में स्नान करते हैं।

शक्तिपीठ में तीन नवरात्र

देवी मंदिरों में आमतौर पर चैत्र और क्वांर महीने में नवरात्र आयोजित की जाती है किंतु दंतेश्वरी शक्तिपीठ में फागुन मडई के नाम से तीसरी नवरात्र होती है। इसे आखेट नवरात्र कहा जाता है। देवी के विभिन्न नौ रूपों के सम्मान में नौ दिन माईजी की डोली निकाली जाती है। यह नवरात्र फागुन मड़ई के नाम के विख्यात है। इस मौके पर 600 से ज्यादा गांवों के देवी- देवता आमंत्रित किए जाते हैं। आदिवासी समाज के लोग रात्रि में चीतल मार, कोडरी मार, गंवर (गौर) मार, लमहा (खरगोश) मार आदि आखेट का अभिनय करते हैं। दसवें दिन अपनी अस्मिता बचाने जौहर करने वाली राजकुमारी चमेली बाबी की याद में सती शिला के समक्ष होलिका दहन किया जाता है।

हजारों ज्योति कलश प्रज्वलित

दंतेश्वरी शक्तिपीठ में दुनिया भर के भक्तों द्वारा प्रतिवर्ष आठ हजार से ज्यादा मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित कराए जाते हैं। माता के प्रति आस्था के चलते ही अमेरिका, कनाडा, मारीशस आदि देशों में बसे भारतीय दंतेश्वरी शक्तिपीठ में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित कराते हैं। यहां शंखिनी नदी में तेल विहीन ज्योति कलश विसर्जित करने की परम्परा है। पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से यह व्यवस्था की गई है। शारदीय नवरात्र के मौके पर हजारों पदयात्री लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचते हैं। इनके लिए जिला प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा नब्बे पदयात्री सुविधा केंद्र संचालित किए जाते हैं।

कैसे पहुंचे दंतेवाड़ा

दंतेश्वरी शक्तिपीठ की दूरी रायपुर से 385 किमी है। यहां पहुंचने के लिए जगदलपुर, विशाखापट्टनम, भद्राचलम, हैदराबाद आदि स्थानों से सुलभ सड़क मार्ग हैं। एक दर्जन से अधिक ट्रैवल एजेंसी की बसें दंतेवाड़ा होकर किरंदुल तक जाती हैं। इसके अलावा विशाखापट्टनम- किरंदुल पैसेंजर और नाइट एक्सप्रेस, भुवनेश्वर-जगदलपुर हीराखंड एक्सप्रेस, हावड़ा- जगदलपुर समलेश्वरी एक्सप्रेस, राउरकेला-जगदलपुर एक्सप्रेस से होकर दंतेवाड़ा पहुंचा जा सकता है। मां दंतेश्वरी के नाम से जगदलपुर में एयरपोर्ट है। रायपुर और हैदराबाद से विमान सेवा की नियमित सेवा उपलब्ध है। जगदलपुर पहुंचकर सड़क व रेल मार्ग से दंतेश्वरी दर्शन हेतु दंतेवाड़ा जा सकते हैं। ठहरने के लिए दंतेवाड़ा और जगदलपुर में सुविधापूर्ण दर्जनों होटल हैं। जो आगंतुक होटलों में नहीं ठहरना चाहते उनके लिए दंतेश्वरी शक्तिपीठ में तीन धर्मशाला हैं।

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