जगदलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि। Sarkeguda fake naxal encounter case बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा में नक्सली मुठभेड़ के नाम पर 17 ग्रामीणों की हत्या की बात न्यायिक जांच में सामने आने के बाद अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट भी खंगाली जाने लगी है। बीजापुर और दंतेवाड़ा कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच एक सितंबर 2015 को यह मामला एनआईए को सौंपा गया था।

एनआईए की विशेष अदालत ने सात जुलाई 2017 को मुठभेड़ मामले में गिरफ्तार दो कथित नक्सलियों को रिहा करने के आदेश दिए थे। एनआईए कोर्ट में जो चार्जशीट दाखिल की गई थी उसके मुताबिक सारकेगुड़ा में 296 राउंड गोलियां चली थीं।

जस्टिस वीके अग्रवाल के नेतृत्व में गठित सारकेगुड़ा घटना विशेष न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 30 गोलियां एके-47 से चलाई गईं जबकि बाकी अन्य हथियारों से। न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सारकेगुड़ा में सिर्फ फोर्स ने गोलियां चलाईं जबकि एनआईए कोर्ट में जो मामला चला उसमें मौके से भरमार बंदूक, छर्रा, डेटोनेटर आदि की बरामदगी दिखाई गई है। न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पुलिस जांच की सत्यता संदेह के दायरे में आ गई है।

सीजेएम कोर्ट बीजापुर और फिर न्यायालय विशेष न्यायाीश एनआईए एक्ट अनुसूचित अपराध बस्तर को सौंपी गई पुलिस की रिपोर्ट में घटनास्थल से बरामद सामग्री की सूची सौंपी गई है। इसमें भरमार बंदूक, एक नग टिफिन बम, एक नग पाइप बम, काले रंग का पिठ्ठू बैग, हरे रंग की शर्ट पेंट, एक वायरलेस सेट, डेटोनेटर, फ्यूज, डायरी, नक्सली साहित्य, बारूद, तीर-धनुष, एके-47 रायफल के 23 और इंसास रायफल के 18 नग खोखे, भरमार बंदूक के छर्रे मिलने की बात कही गई है।

इधर न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में ग्रामीणों की बैठक में नक्सलियों की मौजूदगी का दावा खारिज करने और ग्रामीणों की ओर से गोलीबारी नहीं किए जाने बल्कि फोर्स पर ग्रामीणों के ऊपर अकारण गोलीबारी करने संबंधी तथ्य सामने आए हैं।

आयोग ने रिपोर्ट में ग्रामीणों की बैठक में नक्सलियों की मौजूदगी से भी इन्कार किया है ऐसी स्थिति में घटनास्थल से नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाली सामग्रियां कहां से मिली, इसे लेकर संदेह गहरा गया है। उल्लेखनीय है कि बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा में 28-29 जून को हुई पुुलिस और नक्सलियों के बीच कथित मुठभेड़ में 17 ग्रामीण मारे गए थे। विशेष न्यायिक जांच आयोग ने 17 अक्टूबर को जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी है।

इनका कहना है

सारकेगुड़ा की पुलिस जांच में कोई गड़बड़ी नहीं थी। कोर्ट में केस को साबित करना पड़ता है। थोड़ा भी संदेह हो तो न्यायालय आरोपित को बरी कर देता है। नक्सल मामलों में सजा की दर इसीलिए कम होती है क्योंकि साबित करना आसान नहीं होता। न्यायिक आयोग ने जांच के बाद अपनी सिफारिशें सरकार को दी हैं। अभी शासन स्तर से इसमें आगे की कार्रवाई के संबंध में कोई निर्देश नहीं आया है।

सुंदरराज पी, आईजी बस्तर

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