जगदलपुर। Seminar news : जगदलपुर जिला पुरातत्व संग्रहालय में आयोजित संभाग स्तरीय दो दिवसीय शोध संगोष्ठी में 37 साहित्यकारों व शोधार्थियों ने शोधपत्रों का पठन किया। इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बस्तर विश्वविद्यालय के डा आनंदमूर्ति मिश्रा व साहित्यकार सुभाष पांडे ने कहा कि संगोष्ठी में कई रोचक व तथ्यात्मक जानकारियां सामने आयीं, जो निश्चित तौर पर शोधार्थियों के लिए नए विषय हो सकते हैं। पहले अंग्रेज बस्तर का इतिहास लिख गए और अब बस्तरवासी स्वयं अपना इतिहास लिख रहे हैं। यह प्रशंसनीय और प्रेरक पहल है। विभिन्न् विषयों पर उम्मीद से बढ़कर बेहतर शोधपत्र रहे। कई शोधपत्र राष्ट्रीय स्तर के हैं। इनका विश्लेषण होना चाहिए। इस मौके पर संग्रहाध्यक्ष अमृतलाल पैकरा ने कहा कि शोधपत्रों को संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा शीघ्र प्रकाशित कराया जाएगा।

छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा जिला पुरातत्व संग्रहालय में बस्तर के इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े लोकगीत, किवदंतियों एवं लोक गाथाएं विषय पर दो दिवसीय संभाग स्तरीय शोध संगोष्ठी आयोजित की गई थी। संगोष्ठी में नारायणपुर, कोंडागांव, बीजापुर, बस्तर, कांकेर, दंतेवाड़ा, सुकमा के अलावा बालोद और बिलासपुर जिलों से आए साहित्यकारों और शोधार्थी छात्रों ने कुल 37 शोध पत्र पढ़े। शुक्रवार को जहां 13 विषयों पर शोधपत्र तो शनिवार को 24 शोधपत्र पढ़े गए।

शिवनारायण पांडे नारायणपुर ने बस्तर की गोंडी लोकगीत, सुभाष पांडे जगदलपुर ने बस्तर के मुरिया आदिवासियों की वैवाहिक रस्में, रुद्रनारायण पाणिग्राही जगदलपुर ने बस्तर में प्रचलित किवदंतियां, हेमंत कश्यप ने महिलाओं के गले में पुतरी के रुप में सुरक्षति भारतीय इतिहास व मान्यताएं, शरदचंद्र गौड़ ने बस्तर इतिहास, विक्रम सोनी ने डंडारी नृत्य और गीत, नरेंद्र पांडे ने बस्तर का चर्चित छेरछेरा लोकगीत, तुलसीराम पाणिग्राही गारेंगा ने बस्तरांचल का पारंपरिक छेरका लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ, उत्तम नाइक फरसगांव ने पारंपरिक लोकगीत, राजेंद्र मांझी ने गंगामुंडा का इतिहास व भतरा जनजाति, श्रीमती पूर्णिमा सरोज ने आदिवासी परंपरा को समेटे बस्तर का महापर्व दशहरा, डेंसनाथ पांडे करीतगांव ने भारतीय संस्कृति, पूरनसिंह कश्यप बड़े चकवा ने बस्तर के आदिवासियों का माटी तिहार, सुनील श्रीवास्तव ने लोक कथाओं में पशु-पक्षी व किंवदंतियां, गंगाराम कश्यप ने बस्तर का इतिहास और धुरवा संस्कृति, लोकगीत, किवदंती, पूनम वासम बीजापुर ने एरनाल मुसलोड (गोंडी) शोधपत्र के साथ कोटमसर की अंधी मछलियां कविता तो गंगाराम कश्यप ने नेतानार के नामकरण पर रोचक कहानी सुनाई।

संगोष्ठी के अंत में बाल कलाकार लावण्या मानिकपुरी ने नृत्य प्रस्तुत कर तालियां बटोरी। सभी साहित्यकारों और शोधार्थियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। इस मौके पर पुरातत्ववेत्ता डा ललित शर्मा रायपुर, बंशीलाल विश्वकर्मा, गोपाल सिम्हा, डा बीएल झा विशेष तौर पर मौजूद रहे। संग्रहाध्यक्ष अमृतलाल पैकरा ने आभार माना। कार्यक्रम का संचालन अफजल अली और करमजीत कौर ने किया।

Posted By: Ravindra Thengdi

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