जगदलपुर। उत्तर बस्तर का गांधी के नाम से चर्चित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इंदरु केवट का परिवार पिछले 87 सालों से पैतृक गांव सुरुंगदोह में सुराजी तिरंगा फहराया जा रहा है। इस वर्ष भी उनका परिवार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सुराजी तिरंगा फहराएगा।

इंदरु केवट ने वर्ष 1935 में इस सुराजी तिरंगा को खरीदा था। जिसे परिवार ने संभालकर रखा है। पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार का मुखिया सुराजी तिरंगा को फहराता आ रहा है। बीते 12 सालों से उनके परपोते गिरधारी निषाद राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और इंदरु केवट की जयंती व पुण्यतिथि के दिन इसे फहराते है। इंदरू केवट महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी थे। उन्होंने बस्तर में स्वदेशी आंदोलन की अलख जगाई थी। अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने के आरोप में उन्हें कांकेर जेल में डाल दिया गया था। इस बात से गुस्साए ग्रामीण 200 बैलगाड़ियों से कांकेर पहुंचे और उन्हें छुड़ाया था। इंदरु केवट की लगन, त्याग व सादगी के कारण कांकेर रियासत के आदिवासियों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी निर्णायक भूमिका अदा की थी इसलिए इंदरू केवट उत्तर बस्तर का गांधी के नाम से चर्चित हुए। बस्तर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का शंखनाद करने वालों इंदरू केवट का नाम प्रमुख है। 31 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी धमतरी आए थे। महात्मा गांधी से मिलने इंदरु केवट भी अपने साथी सुखदेव पातर और कंगलू कुम्हार के साथ पैदल धमतरी पहुंचे थे। सुरुंगदोह लौटने के बाद उन्होंने सुरुंगदोह सहित कोड़ेकुर्सी, दुर्गुकोंदल, खंडीघाट, संबलपुर, भानुप्रतापपुर आदि स्थानों में ग्रामीणों से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की अपील की थी। वर्ष 1923 के नागपुर झंडा सत्याग्रह में कांग्रेस ने यह निर्णय लिया था कि कांग्रेस के प्रत्येक सभाए जुलूस तथा अन्य कार्यक्रमों में तिरंगा ध्वजए जिस पर चरखा अंकित हो का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाए। आजादी के इस अभियान को सफल बनाने के लिए इंदरू केवट और उनके साथी कभी राजनांदगांव तो कभी दूर जाकर खादी का झंडा खरीद कर लाते और हर घर झंडा का आव्हान करत गांवों में इन झंडों का वितरण किया करते थे।

विवादों का करते थे निपटाराः इंदरू केवट ब्रिटिश कानूनों के विरोध में गांव में उपजे सभी तरह के विवादों का निपटारा भी किया करते थे और ग्रामीणों को थाना या कचहरी जाने से रोकते थे। ब्रिटिश हुकूमत इंदरु केवट की गतिविधियों से नाराज थी। उसने इंदरु केवट को दबोचने की योजना बनाई लेकिन सफल नहीं हुए। 23 मई 1942 की रात इंदरु केवट कोटरी नदी किनारे अपने साथियों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध बैठक कर रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने दबिश दी और सुकदेव पातर, कंगलू कुम्हार और रंजन हलबा को गिरफ्तार कर ले गई। उस दिन भी इंदरु पुलिस को चकमा देकर फरार हो गए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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