जगदलपुर। Alor cave News: छत्‍तीसगढ़ के जगदलपुर से 104 किलोमीटर दूर कोंडागांव जिले के फरसगांव जनपद अंतर्गत प्रसिद्ध आलोर की गुफा के पट बुधवार को खोले जाएंगे। साल में एक ही दिन के लिए गुफा के द्वार खोले जाते हैं। गुफा में विराजित लिंगई माता के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

आदिवासियों की मान्यता के अनुसार गुफा के द्वार खुलते ही तय हो जाता है कि यह साल बस्तरवासियों के लिए कैसा रहेगा। लिंगई माता को संतानदात्री भी माना जाता है। सैकड़ों निःसंतान दंपती संतान की कामना के साथ लिंगई माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। परंपरानुसार हर साल भाद्र मास के शुक्ल पक्ष द्वादश तिथि को यह अवसर आता है। इसके अनुसार इस साल सात सितंबर बुधवार को तड़के पांच बजे गुफा के द्वार खोले जाएंगे। फरसगांव से बड़ेडोंगर मार्ग पर नौ किलोमीटर दूर आलोर ग्राम स्थित है। गांव के झांटीबंद पारा की पहाड़ी में यह प्राकृतिक गुफा स्थित है। जिसे ग्रामीण लिंगई मट्टा भी कहते हैं। गुफा में लिंगई माता स्वयं विराजित है।

शिवलिंग की पूजा लिंगई माता के रूप में होती हैः छत्तीसगढ़ में आलोर की गुफा ही ऐसी जगह है जहां शिवलिंग की पूजा लिंगई माता रूप में होती है। देवी को संतानदात्री माना जाता है। संतान की कामना के साथ सैकड़ों दंपती यहां आते हैं। बुधवार को सुबह पांच बजे से शाम तक गुफा के द्वार खुले रहेंगे। शाम को गुफा के द्वार बंद कर दिए जाएंगे फिर एक साल बाद निर्धारित मास पक्ष और तिथि के दिन गुफा का द्वारा खोला जाएगा। प्रति वर्ष गुफा बंद करने के पहले लिंगई माता के सामने बिखरी रेत को समतल कर दिया जाता है। अगले साल जब गुफा के द्वार से पत्थरों को हटाया जाता है। उस समय सबसे पहले यह देखा जाता है कि रेत में क्या आकृति उभरी है।

माता को दूध और खीरा : गुफा का द्वार खोलने और आकृतियों का अध्ययन पश्चात सबसे पहले लिंगई माता को बिन व्यापी गाय के दूध से स्नान कराया जाता है। वहीं संतान की अभिलाषा लिए पहुंचने वाले दंपती माता को खीरा भेंट करते हैं। यह क्रम सुबह पांच से शाम पांच बजे तक चलता रहता है। शाम सवा पांच बजे माता पुजारी माटी पुजारी बस्ती से सिरहा गायता ओर ग्राम पटेल की उपस्थिति में गुफा का द्वार बंद कर दिया जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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