हेमंत कश्यप

जगदलपुर (नईदुनिया न्यूज)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के अवसर पर जगदलपुर शहर में ग्रामोद्योग (गांव में लघु-कुटीर उद्योग) में बनी वस्तुओं का बाजार सज गया है। साल में एक बार दशहरा उत्सव के दौरान सजने वाला यह बाजार तीन दिनों तक पूरे चौबीसों घंटे खुला रहेगा। दशहरा उत्सव के प्रमुख स्थल राजमहल के सामने सिरहासार और पैलेस रोड पर भरने वाले बाजार के कारण रौनक बढ़ गई है। बाजार में सुई से लेकर सब्बल तक उपलब्ध है।

ग्रामीण जरूरतोें का प्राय: सामान की दुकान सजी है। फुटपाथ पर सजने वाला यह बाजार बस्तर संभाग का सबसे बड़ा सबसे बड़ा पारंपरिक बाजार है। बस्तर दशहरा की रस्में जहां 75 दिनों में पूरी होती हैं वही इस महा उत्सव के दौरान ग्रामोद्योग को समर्पित लगातार 72 घंटे दिन-रात खुले रहने वाले बाजार में पहले दिन बुधवार से ही खरीददारी के लिए ग्रामीणों की भीड़ उमड़ने लगी है।

इस पारंपरिक बाजार में बस्तर के ग्रामीण क्षेत्र व छत्तीसगढ़ के अन्य इलाकों के साथ ही महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश के कारोबारी पारंपरिक वस्तुओं के साथ पहुंचते हैं तथा तीन दिनों में अपनी हस्त निर्मित वस्तुएं मनचाही कीमत पर बेच लौट जाते हैं।

बस्तर की बांस कला हो या ओडिशा की धान कला, बेलमेटल की सुंदर मूर्तियां हों या रंग-बिरंगे कपड़ों से तैयार देवी-देवताओं के वस्त्र। बच्चों के लिए लकड़ी के खिलौने हों या घरेलू और कृषि कार्य के उपयोगी और बांस की टोकरी या सूप। जरूरत के हिसाब से यहां सब सामान मौजूद है।

245 सालों से सज रहा है बाजार

वन विभाग से सेवानिवृत्त मानचित्रकार शहर के वयोवृद्ध बंशीलाल विश्वकर्मा व सेवानिवृत्त राजस्व निरीक्षक अयूब खान बताते हैं कि बस्तर का यह पारंपरिक बाजार बस्तर महाराजा दलपत देव की राजधानी बस्तर से जगदलपुर स्थानांतरित होने के बाद से लगभग 245 वर्षों से निरंतर जारी है।

ऐसा विशाल बाजार समूचे भारत में किसी भी आदिवासी वनांचल में नहीं सजता। दशहरा के समय 72 घंटे के लिए बाजार भरता है। इस पारंपरिक बाजार को कोरोना महामारी की विभीषिका भी रोक नहीं पाई थी। कोरोना काल में भी परंपरागत वस्तुओं को बनाने वाले ग्रामीण उत्पाद लेकर यहां पहुंचे थे और कोरोना नियमों का पालन करते हुए दुकानें सजाई थी।

प्रशासन नहीं लेता कर

जिला प्रशासन व नगर निगम द्वारा दशहरा बाजार में दुकानारों को विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। इनसे किसी प्रकार का टैक्स (कर) नहीं वसूला जाता। दशहरा उत्सव में आने वाले लोेगों के लिए शहर के सभी सुलभ शौचालय निश्शुल्क कर दिए गए हैं। जगह-जगह पानी के टैंकर रखे गए हैं। पारंपरिक बाजार में चैत परब, भतरी नाट, तथा लक्ष्मी जगार की गायकी करने वाली गुरुमाय भी पहुंचती हैं। बाजार में अपनी कला का प्रदर्शन कर बस्तर की लोक संस्कृति अपनी विधा को कलाकर जीवित रखते हैं।

Posted By: Pramod Sahu

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