जगदलपुर। Bastar Raipur Railway Line: बस्तर व रायपुर के रेलमार्ग से जुड़ने का सपना देखने वाली आंखें पथराने लगी हैं। आजादी के 75 सालों बाद भी इनका सपना अधूरा है। बस्तर में आज कुछ लोग हैं जिन्होंने आजादी के बाद रेललाइन का सपना देखा था। ये ऐसे लोग हैं जो बस्तर को रायपुर से रेल से जोड़ने की चर्चा से लेकर कागजी कार्यवाही तक के साक्षी रहे हैं।

आज इनकी उम्र 90 साल से अधिक हो गई है और बूढ़ी आंखें जवाब दे रही हैं। रेललाइन के इंतजार में पथरा गई हैं। इन्हें नहीं लगता कि उनके जीते जी रेललाइन का सपना पूरा होगा लेकिन एक उम्मीद भी है कि बस्तर की आज की पीढ़ी चाहे तो यह सपना पूरा किया जा सकता है। वन विभाग से मानचित्रकार के पद से 32 साल पहले सेवानिवृत्त होने वाले 92 वर्षीय वंशीलाल विश्वकर्मा, प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत्त होने वाले 96 वर्षीय शिक्षाविद् प्रोफेसर डा. बीएल झा उन लोगों में शामिल हैं, जो आजादी के पहले से लेकर आज तक रेललाइन पर हो रही हर दौर की चर्चा के साक्षी हैं।

वंशीलाल विश्वकर्मा ने तो 1962-1963 में वन विभाग में नौकरी करते हुए बस्तर को रायपुर से रेल से जोड़ने जगदलपुर-रावघाट-दल्लीराजहरा रेलमार्ग परियोजना का खाका खींचा था। ये कभी पेंसिल से कागज पर रेललाइन खींचते और मिटाते थे। नईदुनिया अभियान, बस्तर मांगे रायपुर से रेल की जानकारी मिलने पर इन्होंने नईदुनिया को फोन कर बधाई दी। नईदुनिया ने जगदलपुर शहर की इन हस्तियों से मिलकर रेललाइन को लेकर उनके संस्मरण सुने और इनकी आंखों में रेल के सपनों के अधूरे रहने को लेकर चेहरे पर उदासीनता का भी अनुभव किया।

प्रोफेसर डा. बीएल झा और वंशीलाल विश्वकर्मा 13 मार्च 1955 में यहां शहर के लालबाग मैदान में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का भाषण सुना था। प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा उस सम्मेलन में बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर को रेल से जोड़ने की मांग रखते सुना था। पंडित नेहरू 13 से 15 मार्च तक आयोजित तृतीय राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे।

प्रधानमंत्री को भेंट किए गए अभिनंदन पत्र के शब्दों को प्रोफेसर बीएल झा ने पिरोया था और इसकी डिजाइन वंशीलाल विश्वकर्मा ने तैयार की थी। दोनों उस समय युवा और सरकारी कर्मचारी थे। इन्हें इस बात की काफी खुुशी थी कि मुख्यमंत्री ने रेल की मांग रखी और प्रधानमंत्री ने सहमति मांग पर सहमति जताई थी। हालांकि देश की आर्थिक स्थिति एक साल दो रेललाइन वह भी कठिन भौगोलिक क्षेत्र से होकर बिछाने की पूरा करने की नहीं थी। उल्लेखनीय है कि उसी साल कोत्तावालसा से किरंदुल तक 443 किलोमीटर की रेललाइन बिछाने की योजना तैयार की गई थी। जो जापान के सहयोग से 55 करोड़ रुपये में 1966-1967 में बनकर तैयार कर ली गई थी।

Posted By: Nai Dunia News Network

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