जगदलपुर (अनिमेष पाल)। चंद रुपये के चूना मिट्टी की कीमत छह ग्रामीणों की जान देकर चुकानी पड़ी पर भले ही देखने में दुर्घटना दिखाई देने वाली इन दर्दनाक मौतों के पीछे की सच्चाई कुछ और ही है। इस घटना में गांव की पांच महिलाओं नहीं पांच माताओं की मौत हुई, कई बेटे-बेटियों के सर से मां का साया उठ गया है। आखिरकार इन मौतों के लिए जिम्मेदान कौन है? ग्रामीणों को चंद रुपयों के चूना मिट्टी का लालच या जिस खदान के धसकने से ग्रामीणों की मौत हुई उन जैसे अवैध खदानों के लिए प्रशासन व खनिज विभाग का आंख मूंद कर बैठ जाना।

मालगांव के मुरुम खदान की तरह बस्तर के करीब-करीब हर गांव में इसी तरह से अवैध मुरुम का खनन होता रहता है। पंचायत के प्रतिनिधि सरकार से रायल्टी की चोरी करने ऐसे ही अवैध तरीके से मुरुम की खोदाई कर इन गड्ढों को खुला छोड़ देते हैं। बारिश में जहां ये मौत के गड्ढे बन जाते हैं तो बाकी दिनों में फिर इसी तरह के हादसे होने का खतरा हमेशा रहता है। क्योंकि ये खदान अवैध होते हैं इसलिए इन्हें रेत या मिट्टी से भरने का काम नहीं हो पाता और फिर इस तरह के हादसे होते हैं।

शुक्रवार को भी संभागीय मुख्यालय से दस किमी दूर नगरनार थाना क्षेत्र के मालगांव में छुई मिट्टी(चूना मिट्टी) की तलाश में खोदाई करते हुए छह ग्रामीणों की मुरुम खदान के धसकने से मौत हो गई और तीन लोग घायल हो गए। मालगांव के ग्रामीणों ने बताया कि गांव के वाट्सएप ग्रुप पर इस मुरुम खदान में सोना निकलने की जानकारी के साथ छुई मिट्टी की तस्वीर पिछले चार-पांच दिन से प्रसारित हो रही थी। इसे देखने के बाद मालगांव समेत आसपास के गांव से लोग यहां आकर पिछले दो दिन से मुरुम खदान में छुई मिट्टी की खोदाई कर रहे थे। इस दौरान यह दर्दनाक घटना घटित हो गई।

ग्रामीण जिसे खदान बता रहे वह सरकारी रिकार्ड में नहीं

ग्रामीण जिसे खदान बता रहे हैं सरकारी रिकार्ड में वहां कोई खदान नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक कुछ दिनों से ग्राम पंचायत के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि व अधिकारी इस खदान से खोदाई कर मुरुम निकाल कर गांव के सरकारी भवनों व अन्य निर्माण में उपयोग कर रहे थे। इस खोदाई के दौरान ही यहां छुई मिट्टी मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बाद किसी ने इसका वीडियो बनाकर गांव में प्रसारित कर दिया। खबर फैलते ही ग्रामीण वहां पहुंचने लगे और छुई मिट्टी निकालने का काम शुरु कर दिया। इस घटना में जान गंवाने वाली दशमती के भाई ने बताया कि उसकी दीदी दशमती को वाट्सएप ग्रुप पर इस मुरुम खदान से छुई मिट्टी निकलने की जानकारी मिली थी। इसके बाद दशमती व उनकी देवरानी कमली छुई मिट्टी निकालने के लिए वहां पहुंचे थे।

छुई जिसे ग्रामीण मानते हैं सोना

छुई जिसे हम चूना कहते हैं, ग्रामीणों के लिए किसी किमती खनिज से कम नहीं है। ग्रामीण इसका उपयोग अपने घरों के रंगरोगन के लिए करते हैं। ग्रामीणों ने बताया, एक-दो साल में ही कभी-कभार छुई मिलने की जानकारी मिलती है। इसके बाद गांव के महिलाएं व पुरुष इसे इकट्ठा कर रख लेते हैं और लंबे समय तक घरों में रंगरोगन के लिए इसका उपयोग करते हैं। शुक्रवार को भी इस गांव में जान गंवाने वाले यह ग्रामीण यहीं काम कर रहे थे।

Posted By: Abhishek Rai

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