जगदलपुर। बस्तर समेत राज्य में 700 से 800 देशी सुंगधित धान की किस्मों पर हुए वैज्ञानिक शोध से यह पाया गया कि उनमें औषधीय गुण विद्यमान हैं। साथ ही इनके सेवन से मनुष्य के प्रतिरोधी शक्ति में भी इजाफा पाया गया है। दुर्भाग्यवश इनकी पैदावार कम होने से किसान हाईब्रीड धान की पैदावार कर रहे हैं। वहीं जैविक खाद की बजाय रासायनिक खाद का उपयोग कर रहे हैं। शहर से लगे ग्राम गरावंड की शिक्षित प्रगतिशील महिला कृषक प्रभाति भारत बस्तर के पारपंरिक 250 देशी धान के किस्मों को सुरक्षित करने बीते छह सालों से लगी हुई हैं। उनके प्रयास को भाभा रिसर्च सेंटर मुंबई व पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय ने भी सराहा है। उनके द्वारा संरक्षित 50 वेराटियों को आरएसयू ने पेटेंट की प्रक्रिया हेतु केंद्र सरकार को भेजा है।

प्रभाति भारत को शुरू से ही जैविक खेती से लगाव रहा है। उनके पति विजय भारत ने भी उन्हें इसके लिए प्रेरित किया। शहर से करीब 12 किमी दूर ग्राम गरावंड में उनका 10 एकड़ कृषी भूमि है। उन्होंने वर्ष 2016 में किसी मैग्जीन में भाभा रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक की शोध रिपोर्ट पढ़ी जिसमें बताया गया था कि अधिक रासायनिक खाद के उपयोग से पैदा किए गए अनाज के सेवन से मानव जीवन पर किस प्रकार के दुष्प्रभाव होते हैं।

उसके बाद उन्होंने बस्तर के बुजूर्ग किसानों से देशी धान के विषय में जानकारी एकत्र करना शुरू किया। अपने खेत उन्होंने औषधीय फसल और देशी धान की फसल लेने के लिए स्थानीय कृयी विज्ञान केंद्र व रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक दीपक शर्मा से भी तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त किया। इसके बाद सुदूर गांवों के किसानों से बस्तर के सुंगधित देशी धान की किस्मों लोकटी माछी, गडबन, लाइचा समेत सुगंधित विष्णुभोग व तुलसी मंजरी आदि देशी किस्मों की बीज खरीद कर फसल लगाना शुरू किया। रासायनिक खाद की बजाय केचुआ जैविक खाद का उपयोग किया।

हालांकि हाईब्रिड धान की तुलना में पैदावार एक तिहाई ही होता रहा। घाटे के बावजूद उन्होंने देशी बीजों का संरक्षण जारी रखा। बीज बैंक बनाकर आसपास के गांवों के किसानों को भी कम दाम में बीज उपलब्ध करवाती हैं। अब तक 250 किसानों को वे बीज मुहैया करवा चुकी हैं। एक बार शहर में किसान प्रदर्शनी में उन्होंने अपने बीजों का प्रदर्शन किया। इसके बाद खेती-किसानी से संबंधित पत्रिका ने उनकी खबर छापी। इसके बाद उन्हें रविशंकर विश्वविद्यालय और भाभा रिसर्च सेंटर मुंबई की ओर से सम्मानित किया गया।

साथ ही आएसयू के प्रतिनधि मंडल ने उनके फार्म का अवलोकन भी किया। उनके द्वारा संरक्षित किए जा रहे किस्मों में से 50 किस्मों के सैंपल पेटेंट हेतु केंद्र सरकार को भेजा। इसकी प्रक्रिया चल रही है। अपने फार्म में उपजे देशी धान को वे बाजार में भी बेचती हैं। साथ ही किसानों को बीज के रूप में भी देती हैं। बेहतर ढंग से जैविक खेती सीखने के लिए उन्होंने वन विभाग के मदद से बैंगलुरु स्थित ट्रेडिशनल रिसर्च सेंटर से प्रशिक्षण भी लिया है। प्रभाति चाहती हैं कि जैविक खेती को बढ़ावा देने सरकार को बड़े पैमाने पर जैविक खाद बनाने व रासायनिक खाद का उपयोग कम करने जागरूकता का प्रयास करना चाहिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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