जांजगीर-चांपा। (नईदुनिया न्यूज)। बाल मंदिर यह वह स्थान है जहां भगवान स्वरूप माने जाने वाले छोटे- छोटे बच्चे खेल-खेल में पढ़ना सिखते हैं। मगर जिला मुख्यालय जांजगीर के बाल मंदिर की पहचान फल और मछली मार्केट से होने लगी है। नगर पालिका जांजगीर - नैला के वार्ड 15 में संचालित बाल मंदिर में पढ़ने वाले बच्चे गंदगी और दुर्गंध के बीच तालीम लेने के लिए मजबूर हैं। बाल मंदिर परिसर में ही नगर पालिका द्वारा पᆬल विक्रेताओं और मछली व्यवसायियों के लिए अस्थाई जगह दिया गया है। नगर पालिका के द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

कहते हैं बाल मंदिर शिक्षा में आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है। लेकिन नगर पालिका जांजगीर-नैला के वार्ड 15 में संचालित बाल मंदिर जिला प्रशासन, नगर पालिका और जनप्रतिनिधियों और समाज सेवियों की सदस्यों की निष्क्रियता का पर्याय बन गया है। पहले यहां बुधवारी बाजार के फल व्यापारियों को जगह दी गई। इसके बाद सालभर से मुर्गा-मछली व्यापारियों को बैठाया जा रहा है। बाल मंदिर शिक्षा का मंदिर न बनकर मछली मार्के ट बनकर रह गया है। मछली मार्केट से आने वाली दुर्गंध से बच्चे और शिक्षिका परेशान होती हैं। इतना ही नहीं प्रति बुधवार को साप्ताहिक पᆬल बाजार लगता है। पᆬल व्यावसायी दिनभर दुकानदारी करने के बाद सड़े गले पᆬलों को और पैरा, पेपर आदि कचरा को बाल मंदिर परिसर में पᆬेंक देते हैं। सड़े गले पᆬलों से दुर्गंध उठती रहती है। बाल मंदिर में वर्तमान में करीब 28 बच्चे अध्ययनरत हैं। कोरोना काल की वजह से कुछ बच्चे आ रहे हैं। बाल मंदिर में पढ़ने वाले ये बच्चे गंदगी और दुर्गंध के बीच तालीम लेने के लिए मजबूर हैं। बच्चे परिसर में पसरी गंदगी के बीच खेलते रहते हैं। मगर इससे नगर पालिका के जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को कोई सरोकार नहीं है। नगर पालिका के द्वारा यहां की नियमित सपᆬाई नहीं कराई जाती है और न ही दवा का छिड़काव कराया जाता है। नगर पालिका के द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। बुधवार 20 अक्टूबर को साप्ताकि बुधवारी बाजार लगी थी । पᆬल विक्रेता सड़े गले पᆬलों और कचरा को छोड़ गए हैं मगर दो दिन बाद भी नगर पालिका के द्वारा यहां सपᆬाई नहीं कराई गई है। बाल मंदिर में पढ़ने वाले बच्चे गंदगी और दुर्गंध के बीच दो दिनों से पढ़ रहे हैं।

वार्ड पार्षद को भी नहीं सरोकार

नगर पालिका पीआईसी की बैठक पिछले साल 22 जनवरी को हुई थी जिसमें फुटकर व्यापारियों को बाल मंदिर में स्थान देने का प्रस्ताव पास किया गया। इसके बाद पालिका के अध्यक्ष -उपाध्यक्ष और सदस्य व्यापारियों के आंदोलन स्थल पर पहुंचे और उन्हें जानकारी देते हुए उनका आंदोलन समाप्त कराया। पीआईसी के सदस्यों ने एक बार भी नहीं सोचा कि जिस बाल मंदिर में मछली व्यापारियों को बैठाया जाएगा वहां छोटे- छोटे मासूम बच्चे पढ़ते हैं। बच्चे यहां दुर्गंध और गंदगी के बीच कैसे बैठ सकेंगे। वार्ड 15 के पार्षद को भी बच्चों को होने वाली परेशानी और सपᆬाई - सपᆬाई से कोई मतलब नहीं है।

1968 से संचालित है बाल मंदिर

जिला मुख्यालय जांजगीर के वार्ड क्रमांक 15 में संचालित बाल शिक्षा मंदिर की नींव 2 फरवरी 1968 को मध्यप्रदेश के तत्कालीन खाद्य मंत्री रामेश्वर प्रसाद शर्मा ने रखी थी। इस बाल मंदिर में पढ़ने वाले उस समय के बच्चे विभिन्न शासकीय सेवाओं में अपनी सेवा देकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इतने सालों बाद भी बाल मंदिर को देखकर वे अपना बचपन याद करते हैं। वर्तमान में बाल मंदिर में 30 बच्चे अध्यनरत हैं। अब उन बच्चों को गंदगी और दुर्गंध के बीच बैठकर पढ़ लिखकर आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी पास करना है।

'' आज रायपुर बैठक में आई हूं। मामले की जानकारी लेकर उचित कार्रवाई की जाएगी।

रोमा श्रीवास्तव, प्रभारी सीएमओ

नगर पालिका जांजगीर - नैला

Posted By: Nai Dunia News Network

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