जांजगीर-चांपा । दशहरा व दीपावली के अवसर पर रामलीला मंचन की परम्परा गांव-गांव में रही है। मगर टीवी और पिुल्मों के चलन से अब गांवों में लीला मण्डलियां बिखर गई। अब गिने चुने गांवों में ही रामलीला का आयोजन किया जाता है। वहीं बनारस, हरिद्वार व अन्य स्थानों से लीला मण्डलियों को नहीं बुलाया जाता।

दो दशक पूर्व दशहरा के समय गांव-गांव में रामलीला का आयोजन किया जाता था। लीला में पुरूष कलाकार ही अभिनय करते थे। महिला पात्रों की भूमिका भी वे निभाते थे, लेकिन टीवी के घर-घर घुसपैठ और चैनलवार के चलते लीला नाटक का चलन ही समाप्त हो गया। यदाकदा किसी गांव में रामलीला का मंचन होता भी है तो पहले ही तरह भीड़ नहीं जुटती। विभिन्न् चैनलों में धार्मिक सीरियलों की बाढ़ और मल्टीमीडिया की उन्न्त तकनीक के चलते रामलीला से लोग अब दूर हो गए। रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथो का नाट्य रूपांतरण कर चैनलों में बेहतर प्रदर्शन किए जाने से लोगों का रूझान अब रामलीला से घट गया। यह अब कुछ ही गांवों में सिमट गया। पहले जिले के गांव-गांव मेंे रामलीला करने के लिए मण्डलियां थी, लेकिन अब उनका अस्तित्व नहीं है। नवागढ़ ब्लाक के ग्राम बर्रा, केरा, नेगुरडीह, बनारी, खोखरा व गंगाजल सहित अन्य कई गांवों में रामलीला का मंचन होता था, लेकिन इन गांवों में अब मण्डली अस्तित्व में नहीं है। अब लोग टीवी , मोबाइल के माध्यम से धार्मिक सीरियल देख लेते हैं इसके कारण लीला नहीं होती।

बैरिस्टर ने भी बनाई थी मंडली

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बैरिस्टर ठा. छेदीलाल ने भी आजादी के पहले रामलीला मण्डली गठित की थी और वे लीला के माध्यम से गांव-गांव में स्वराज्य का संदेश देते थे। इनकी मण्डली में कोटमीसोनार, अकलतरा, कापन, नंदेली सहित अन्य गांवों के कलाकार शामिल थे।

नहीं मिलता शासकीय सहयोग

लीला मण्डलियों को शासन से संरक्षण नहीं मिलने के कारण ये अपना अस्तित्व खो रही है। कुछ मण्डलियां चंदा व चढ़ोतरी के भरोसे इस विधा को जीवित रखने संघर्ष कर रही है। आने वाले दिनों में रामलीला मण्डलियां की पहचान ही खत्म हो सकती है।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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