चांपा (नईदुनिया न्यूज)। सिंधी समाज का थदिड़ी पर्व ठंडा और शीतल भोजन करके मनाया जाता है। सिंधी समाज के प्रमुख दिलीप मीरचंदानी ने बताया कि थदिड़ी शब्द का सिन्धी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल , रक्षाबंधन के आठवें दिन इस पर्व को समूचा सिंधी समुदाय। हर्षोल्लास से मनाता है।

चाम्पा के सिंधी कालोनी में श्री झूलेलाल मंदिर में एकत्रित होकर माता शीतला की पूजा अर्चना की गई। सुबह से ही महिलाएं तैयार होकर एक स्थान पर एकत्रित होकर भजन कीर्तन किया गया। दिनभर प्रसाद के रूप में बना हुआ व्यंजन बांटा गया। ऐसी मान्यता है हजारों वर्ष पूर्व मोहन जो दड़ो की खुदाई में मां शीतला देवी की प्रतिमा निकली थी। ऐसी मान्यता है कि उन्हीं की आराधना में यह पर्व मनाया जाता है। थदिड़ी पर्व को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां भी व्याप्त हैं। कहते हैं कि पहले जब समाज में तरह-तरह के अंधविश्वास फैले थे तब प्राकृतिक घटनाओं को दैवीय प्रकोप माना जाता था। समुद्रीय तूफानों को जल देवता का प्रकोप, सूखाग्रस्त क्षेत्रों में इंद्र देवता की नाराजगी समझा जाता था। इसी तरह जब किसी को माता (चेचक) निकलती थी तो उसे दैवीय प्रकोप से जोड़ा जाता था, तब देवी को प्रसन्ना करने के लिए उसकी स्तुति की जाती थी और थदिड़ी पर्व मनाकर ठंडा खाना खाया जाता था। इस त्यौहार के एक दिन पहले हर सिन्धी परिवार में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। रात को सोने से पूर्व चूल्हे पर जल छिड़क कर हाथ जोड़कर पूजा की जाती है। इस तरह चूल्हा ठंडा किया जाता है। दूसरे दिन पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है एवं एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है। इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएं या बावड़ी के पास इकट्ठे होते हैं वहां मां शीतला देवी की विधिवत पूजा की जाती है। इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। अब लोग घरों में ही पूजा कर लेते हैं और माता के प्रकोप से बचने की प्रार्थना की जाती है। पर्व के दिन बहन और बेटियों को विशेषकर मायके बुलाकर इस त्यौहार में शामिल किया जाता है। इसके साथ ही उसके ससुराल में भी भाई या छोटे सदस्य द्वारा सभी व्यंजन और फल भेंट स्वरूप भेजे जाते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close