पत्थलगांव(नईदुनिया न्यूज)। असूचीबद्ध की मांग के विरोध में ईसाई आदिवासी महासभा पत्थलगांव द्वारा रैली निकाली गई। इसमें बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल हुए। रैली बंदियाखार चर्च से प्रारंभ होकर इंदिरा चौक तक पहुंची। यहां राष्ट्रपति के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर आदिवासी समाज के लोगों का मतांतरण के बाद भी आदिवासी का दर्जा बरकरार रखे जाने की मांग की गई। उल्लेखनीय है कि मतांतरण करने वाले आदिवासियों को आदिवासी का दर्जा वापस लिए जाने की मांग एक अर्से से की जा रही है। इसके विरोध में शनिवार को ईसाई आदिवासी महासभा पत्थलगांव की ओर से रैली का आयोजन किया गया। इसे लेकर सुबह से ही शहर में चर्चा का माहौल गर्म था। याकूब कुजूर की अगुवाई में लोग बंदियाखार स्थित चर्च परिसर में इकट्ठा हुए। रैली में शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी ईसाई समाज के लोग यहां पहुंचे थे। दोपहर करीब 2 बजे यहां से रैली प्रारंभ हुई। इस दौरान लोगों ने ईसाई समाज की आदिवासी के रूप में असूचीबद्ध के विरोध में नारे लगाए। जानकारी के अनुसार ईसाई महासभा की ओर से आयोजित होने वाली रैली एसडीएम कार्यालय तक जानी थी परंतु इससे इंदिरा गांधी चौक में ही रोक दिया गया। यहां सामाजिक कार्यकर्ता मोनिका टोप्पो, उच्च न्यायालय की अधिवक्ता सृष्टि खलखो व कुनकुरी के पीसी कुजूर ने लोगों को संबोधित किया। याकूब कुजूर ने बताया कि हमारी एकमात्र मांग है कि मतांतरण के बाद भी आदिवासियों का दर्जा बरकरार रखा जाना चाहिए। ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासी समाज के लोगों की असूचीबद्ध की मांग को पूरी तरह गलत ठहराते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के लोगों द्वारा ही आदिवासियों की असूचीबद्ध की मांग की जा रही है। परंतु संविधान में जो प्राविधान किए गए हैं, वे जाति के आधार पर हैं न कि धर्म के आधार पर। इसलिए इसे बरकरार रखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि सभी आदिवासी भाई भाई हैं। उन्हें आपस में लड़ाई नहीं करनी चाहिए और एक बने रहना चाहिए। इसी में सभी आदिवासियों का भला है। उनका कहना है कि आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं वे पांचवीं अनुसूची के आधार पर मिले हैं। परंतु ईसाई आदिवासियों की असूचीबद्ध से आदिवासियों की संख्या कम हो जाएगी और इससे पांचवीं अनुसूची के साथ ही सभी आदिवासियों को डिशिड्यूल करने का खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि संविधान में कोई भी धर्म मानने की स्वतंत्रता है। सुप्रीम कोर्ट का भी निर्णय है कि व्यक्ति कोई भी धर्म मान सकता है परंतु इसके बावजूद जाति अपरिवर्तित रहती है। उन्होंने ईसाई आदिवासियों पर आदिवासी परंपराओं का पालन नहीं करने के आरोपों को भी गलत ठहराया। उन्होंने कहा कि दूसरा पक्ष आरोप लगाता है कि धर्मांतरण के बाद लोगों द्वारा आदिवासियों के रीति रिवाजों का पालन नहीं किया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि ईसाई आदिवासियों द्वारा भी जन्म से लेकर मृत्यु तक आदिवासी रीति रिवाज का ही पालन किया जाता है। पत्थलगांव में भी प्रतिवर्ष करमा और अन्य आयोजन किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की संस्कृति को बचाने के लिए ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी लोग प्रयासरत हैं और निरंतर अपनी परंपराओं और रीति रिवाजों से जुड़े हुए हैं इसलिए उन्हें असूचीबद्ध नहीं किया जाना चाहिए।

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Posted By: Nai Dunia News Network

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