जशपुरनगर। राजस्व रिकार्ड के अभाव में विशेष संरक्षित जनजाति बिरहोर के लोगों का जाति प्रमाण पत्र बनवाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अपनी परेशानी से अवगत कराने के लिए सोमवार को बिरहोर समाज के लोग कलेक्टर जनचौपाल में पहुंचे।

बिरहोर जनजाति के लोग जाति प्रमाण पत्र की शिकायत लेकर पहुंचे ,जाति बिरहोर समाज के प्रमुख बीरबल राम ने बताया कि उनके समाज के लोगो के पास जमीन और मिसल नहीं है। इस कारण समाज के लोगो को जाति प्रमाण पत्र बनवाने में समस्या आ रही है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन ने विशेष पिछड़ी जनजाति के युवको के लिए सीधी भर्ती का अभियान चलाया जिसमे तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की भर्ती बिना परीक्षा आयोजन के की जाती है। जिसमे बिरहोर पिछड़ रहे है। बिरहोर जिले में भितघरा में 28 परिवार कंचनपुर में 30 परिवार और बेहरखार में 32 परिवार है।इनकी कम संख्या की वजह से इस जनजाति समुदाय के विकास पर किसी भी राजनीतिक दल के फोकस में नहीं है। बीरबल राम बताते है कि जिन जनजाति समुदाय के लोगो का जाति प्रमाण पत्र नहीं बना वहां पंचायतो को यह अधिकार है कि ग्राम सभा में उस व्यक्ति के निवास और जाति के संबध में प्रस्ताव पारित करे जिसके आधार पर जाति प्रमाण पत्र बनाया जाता है। तीनो गांवों के दर्जनो बधो अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद विशेष भर्ती अभियान में भर्ती होने की आशा में थे। लेकिन पंचायत और पटवारी से जाति प्रमाण पत्र नहीं बनवा सके। जिसके बाद थक हारकर कलेक्टर के पास पहुंचे। जिसके बाद जशपुर कलेक्टर डा रवि मित्तल ने उनकी समस्या का शीघ्र निवारण का आश्वासन दिया है। सरकार विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। उन्हें अपनी पारंपरिक शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली को छोड़ने और जीवन के आधुनिक तरीके को अपनाने के लिए मजबूर किया गया। विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिन्हें अपनी पारंपरिक शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली को छोड़ने और जीवन के आधुनिक तरीके को अपनाने के लिए मजबूर किया गया था।इन्हें जंगली बेलों से रस्सियां बनाने में महारत हासिल है। लेकिन धीरे-धीरे जंगली बेलों की जगह प्लास्टिक के बोरे से निकले धागे ने ले ली है। अब रस्सी बनाकर बेचना और बकरी पालन करना इनका मुख्य पेशा बन गया है। सरकार ने बिरहोर को संरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास किया है। दुर्गम पहाड़ों पर सरकार ने बिजली-पानी पहुंचाया है। बिरहोरों के लिए घर बनाए गए हैं। स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र हैं। सभी बिरहोर को सरकार की तरफ से पेंशन भी दिया जाता है। इसके बावजूद बिरहोर जाति का विकास नहीं हो रहा है। इसकी वजह उनकी जड़ों में या जंगल में रोजगार मिलना नहीं है।शिक्षा और रोजगार में सबसे बड़ा रोड़ा जाति प्रमाण पत्र न बनना है।

मध्यप्रदेश शासनकाल में किया गया था स्थापित

बिरहोर जनजाति भी विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवाओं के समान,घने पहाड़ी क्षेत्र में रहा करते थे। इस जनजाति को बंदर का मांस खाने के लिए भी जाना जाता है। विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए तात्कालिन सरकार ने विशेष प्रयास कर इन्हें जंगल से बाहर लाकर बस्ती में बसाया था। लेकिन जंगल में रहने के आदि हो चुके बिरहोरों को समाज में घुलने मिलने में काफी समय लग गया। हालांकि लंबे समय से चल रहे प्रयास का परिणाम अब सामने आने लगा है। शिक्षा को लेकर समाज में जागृति आई है। इसी का नतीजा है कि लोग अब जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकारी आफिसों के चक्कर काटने लगे हैं।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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