जशपुरनगर। दशहरा महोत्सव का शुभारंभ शारदीय नवरात्र के पहले दिन से यहां के सबसे पवित्र स्थल माने जाने वाले पक्की डाड़ी वृक्ष गंगा से प्रारंभ होता है। जहां मान्यता अनुसार जिले की सत्ता को संचालित करने वाले देव बालाजी भगवान के मंदिर और काली मंदिर से अस्त्र-शस्त्रों को लाकर पूजा की जाती है. यह अनुष्ठान विश्व कल्याण की प्रार्थना के साथ राज परिवार के सदस्यों, आचार्यों , बैगाओं और नागरिकों के द्वारा प्रारंभ किया जाता है. एक झांकी के रूप में पक्की डाड़ी से पवित्र जल गाजे- बाजे के साथ देवी मंदिर मे लाया जाता है। जहां कलश स्थापना कर अखंड दीप प्रज्वलित की जाती है। इसी के साथ नियमित रूप से 21 आचार्यों के मार्गदर्शन में राजपरिवार के सदस्य सहित नगर व ग्रामों से आए श्रद्वालु मां दुर्गा की उपासना वैदिक, राजसी और तांत्रिक विधि से करते हैं. अनुष्ठान में पूरे नवरात्र तक हजारों की संख्या में श्रद्वालु शामिल होते हैं।

हाथी में सवार होकर विश्व कल्याण के लिए आएंगीं जगत जननी

जगत जननी मां दुर्गा इस बार शेर पर सवार ना होकर हाथी पर सवार होकर संसार का कल्याण करने आ रही हैं। नवरात्रि का पर्व 26 सितंबर से शुरू होकर 4 अक्टूबर तक चलेगा। इन दिनों में मैया की भक्ति में शहर डूबा रहेगा। नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू हो रही हैं। इस दौरान माता को प्रसन्ना करने के लिए लोग बहुत तरह से उनकी पूजा उपासना करेंगे। सर्वविदित है कि माता की सवारी शेर है। लेकिन नवरात्रि मैं उनके वाहन उनके आगमन के दिनों के अनुसार बदलते रहते हैं। इस बार वाराणसी पंचांग और मिथिला पंचांग के अनुसार माता का आगमन हाथी पर होगा। जिसे शुभ माना जा रहा है। शारदीय नवरात्रि शुक्ल योग और ब्रह्म योग में शुरू होगी। वही कन्या राशि में बुध, सूर्य, शुक्र, चंद्रमा मिलकर चतुर ग्रही योग का निर्माण करेंगे। शुक्र ग्रह कन्या में नीच के होते हैं। किंतु बुध के साथ होने से नीच राज भंग योग बनाएंगे जिससे लक्ष्मी मां प्रसन्ना होंगी। 26 सितंबर को सुबह 8:06 बजे से ब्रह्म योग लगेगा। जो 27 सितंबर को समाप्त होगा। वही शुक्ल योग 25 सितंबर सुबह 9:06 से अगले दिन 8:00 बजे तक रहेगा। शारदीय नवरात्रि में यह दोनों योग के होने से माता के भक्तों के जीवन में सुख समृद्धि बढ़ेगी। संतान शिक्षा के साथ स्त्रियों के लिए धन प्राप्ति के अवसर नवरात्रि पर बनेंगे। तथा सर्वत खुशहाली और सुख संपदा फैलेगी।

इस तरह करे वेदी का निर्माण

पवित्र स्थान की मिट्टी लेकर बेदी बनाएं वहां गेहूं बोए अपनी सामर्थ्य के हिसाब से बनाए गए। सोना, तांबा, मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, पत्थर या मिट्टी की प्रतिमा रख दें, मूर्ति नहीं रख पाने की दशा में कलश पर स्वास्तिक और उनके दोनों और माता के चित्र रखकर पूजा अर्चना करें, कलश में जल, गंगाजल ,रोली, हल्दी सिक्का, सुपारी डालें। कलश के मुंह से 5 बार मौली बांधे। कलश के ऊपर आम के पत्तों में नारियल रखें। इसे भी मौली से बांधे। तुलसी का उपयोग नहीं करें।

Posted By: Yogeshwar Sharma

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