वेदप्रकाश मिश्रा,कांकेर। आज की मतलबी दुनिया में जब जमीन-जायदाद और दौलत के लिए लोग रिश्ते-नाते भूल जा रहे हैं। भाई भाई का दुश्मन बन जा रहा है। वैभव और विलासिता भरी जिंदगी जीने के लिए लोग ऐन-केन-प्रकारेण रुपया कमाने में लगे हैं, तब कांकेर नगर की बेसहारा बुजुर्ग बिसरी बाई साहू ने अपने जीवनभर की जमापूंजी दो लाख रुपये बेसहारा बालिकाओं के लिए दान कर मिसाल कायम की है।

पांच साल पहले पति की मौत के बाद वह इस दुनिया में अकेली है। संतान नहीं होने के कारण पति ने कहा था कि सारी संपत्ति और जमापूंजी बेसहारों को दान कर देना। सेवाभावी वृद्घा ने अपनी दिली इच्छा पूरी कर पति से किए वादों का सम्मान किया है।

नगर के शीतलापारा निवासी बिसरी बाई के पति रमचुराम बैलगाड़ी चलाते थे। कृषि कार्य से जीवनयापन होता था। यहां उनका खपरैल वाला मकान है। पांच साल पहले रमचुराम उन्हें इस दुनिया में अकेला छोड़ गए। जिंदगी में वीरानी छा गई, लेकिन सेवा की वह मशाल बिसरी बाई ने बुझने नहीं दिया, जो पति के साथ मिलकर उन्होंने जलाई थी।

पांच साल में नून-भात (नमक के साथ पका चावल) खाकर, पाई-पाई इकठ्ठा कर बिसरी बाई ने दो लाख रुपये जमा किए थे। करीब छह माह पहले कलेक्टर केएल चौहान से मिलकर उन्होंने अपनी इच्छा जताई थी। आज बिसरी बाई के दान किए दो लाख रुपये सात बेसहारा बालिकाओं के नाम डाकघर की योजना में जमा कर दिए गए। इस मौके पर कलेक्टर केएल चौहान और अधिकारियों ने बिसरी बाई का शॉल और श्रीफल भेंटकर सम्मान किया।

सादा जीवन और उच्च विचार

सादा जीवन जीने वाली बिसरी बाई ने बताया कि उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है। सिर्फ एक मकान है, जिसके कुछ हिस्से को किराये पर दे रखा है। उससे होने वाली आठ हजार रुपये की आमदनी से पेट पाल लेती हैं। वे कहती हैं कि उनके मन में हमेशा ही कम से कम खर्च कर रुपये बचाने की इच्छा रही, जिससे ज्यादा से ज्यादा मदद कर सके।

बीमार पड़ने पर किरायेदार ही करते हैं देखभाल

बिसरी बाई ने बताया कि उसके चार भाई समेत अन्य रिश्तेदार भी हैं, लेकिन पति की इच्छा थी कि बेसहारों की ही मदद करें। वे जब बीमार पड़ती हैं, तो किरायेदार ही अपने खर्च पर इलाज कराते हैं। किराया मिलने पर खर्च किए रुपये वे लौटा देती हैं। वे कहती हैं कि अब उनके पास बैंक में कुछ भी नहीं बचा है।

घर भी दान करने की इच्छा

बिसरी बाई कहती हैं कि मृत्यु से पहले वह अपना घर भी दान करना चाहती हैं। चूंकि अभी इसी से गुजर-बसर चल रहा है। सिर छिपाने के लिए और कोई आसरा नहीं है। इसलिए दान नहीं कर रही हैं। उन्होंने बताया कि इसके पहले वे मोहल्ले की पानी टंकी के लिए जमीन दान की थीं।

बालिकाओं के नाम से रुपये जमा

दो लाख रुपये सात बेसहारा बालिकाओं के नाम से डाकघर की बचत योजना के तहत जमा कर दी गई है। इन बालिकाओं में दो की उम्र दस वर्ष से कम है। इन दोनों के नाम से 32-32 हजार रुपये और पांच बालिकाओं के नाम 28-28 हजार रुपये जमा किए गए हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network