बरबसपुर। खुबसूरती की सुनहरी चादर ओढ़े छत्तीसगढ़ के लोगों के जीने का तरीका अजब-गजब है। गर्मी और बरसात में टोपी और छतरी का सहारा हम सभी लेते हैं, लेकिन इस खास टोपी की खासियत है। छत्तीसगढ़िया लोग इसे 'खुमरी' के नाम से जानते हैं। यह एक ऐसा टोपी है, जो न सिर्फ जेब का भार कम करती है बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है। उल्टे पतीले की तरह दिखने वाली खुमरी बांस से बनाई जाती है, जो बेहद हल्की होती है और इसमें अगर रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े और सजावटी सामान लग जाए तो इसकी सुंदरता के क्या कहने हैं। आकार में बड़ा होने के कारण ये धूप से तो बचाता ही है, साथ ही बारिश की बूंदें भी इसके अंदर नहीं जा पातीं। छत्तीसगढ़ में अक्सर चरवाहों, गांव के बुजुर्गों और खेत-खलिहान में काम करने वालों को खुमरी पहने देखा जा सकता था, पर अब धीरे-धीरे आधुनिकता के इस चकाचौंध में ग्रामीण क्षेत्र की खुमरी विलुप्त होने के कगार पर है।

किसान पहले बांस की बनी खुमरी का उपयोग करते थे। हर परिवार के सदस्य बारिश के मौसम में पानी और धूप से बचाव के लिए इसका उपयोग करते थे। हर घरों में खुमरी होती थी। खेत में निदाई और गुड़ाई के समय भी किसान खुमरी को साथ रखते थे। लेकिन अब अंचल के गांवों में एक दो लोगों को ही खुमरी का उपयोग करते देखा जाता है।

बारिश व धूप से मिलती है राहत

बुजुर्गों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में खेती-किसानी में काम करते समय इस खुमरी का सभी लोग उपयोग करते थे, जहां धूप से राहत मिलती थी, वहीं बारिश में काफी हद तक बचाव होता था। जब ग्रामीण इस खुमरी को लगाते थे उस समय पालीथीन का चलन बाजार में नहीं था। धीरे- धीरे लोगों को आधुनिक सुविधाएं मिलती गई और लोग खुमरी छोड़ते गए। काफी पुरानी इस खुमरी को गांव में कम ही किसान उपयोग करते दिख रहे हैं। खुमरी के बारे में बुजुर्ग किसानों से चर्चा करने पर लोगों ने कहा कि यह एक संसाधन हुआ करता था। अब हम लोगों के पास नहीं है। बारिश में इसका उपयोग सभी लोग करते थे। धूप में भी काफी बचाव मिलता था। गांव की पुरानी परंपरा खत्म होती जा रही है। अब तो सिर्फ कुछ बुजुर्ग लोग ही इसका उपयोग करते दिख जाते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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