बरबसपुर। फसल काटने के बाद अनुपयोगी पैरा को फिर से जलाने का सिलसिला शुरू हो चुका है, जबकि इसे रोकने की आवश्यकता है, इससे जहां एक ओर वायु प्रदूषण होता है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी की उर्वरता क्षमता भी इससे कम होती जाती है।

उत्पन्न गैसों से पर्यावरण होता है प्रदूषित

किसान हाइब्रिड किस्म की खरीफ फसल की कटाई के बाद मिंसाई भी करने लगे हैं। बीते कई वषोर् से देखा गया है कि ग्रामीण हार्वेस्टर व छोटी कटिंग मशीन से खरीफ फसलों की कटाई कराते और फसल का आधी डंठल खेत में ही छोड़ दी जाती है। इस पैरा को किसान आग लगाकर जला देते हैं। इसके चलते पशुओं के उपयोग में नहीं आ पाता और नष्ट हो जाता है। पराली जलाने में उत्पन्न होने वाली गैसों से पर्यावरण को प्रदूषित होता है। साथ ही मिट्टी में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और सूक्ष्म जीव भी मर जाते हैं। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। इसके धुएं का दुष्प्रभाव मानव शरीर पर पड़ता है। जिसके कारण फेफड़े की बीमारी सांस लेने की तकलीफ और कैंसर जैसे रोग भी हो सकते हैं, वही पशु पक्षियों को भी इससे नुकसान होता है।

पराली जलाने से खेतों को यह नुकसान होगा

खेता में 1 टन पैरा जलाने से 3 किलो पर्टिकुलेट मैटर, 60 किलो कार्बन मोनोअक्साइड, 1460 किलो कार्बन डाइअक्साइड, 2 किलो सल्फर डाइअक्साइड जैसे गैसो का उत्सर्जन और 199 किलो राख उत्पन्न होती है अनुमान यह भी है कि 1 टन धान का पैरा जलाने से मृदा में मौजूद 5 या 5 किलोग्राम सल्फर नष्ट हो जाता है। अर्थदंड का प्रावधान दंडाधिकारी आदेश में बताया गया है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा सन्‌ 2016 में फसल अपशिष्ट जलाने पर अर्थदंड का प्रावधान भी कर रखा है। क्षेत्रीय अधिकारी छत्तीसगढ़ पर्यावरण मंडल और संयुक्त संचालक पशु चिकित्सा सेवा के प्रस्तुत प्रस्ताव के अनुसार प्रतिबंध का यह आदेश जारी किया गया है।

गोठानों में पैरादान करने का किया जा रहा आग्रह

किसानों से गौठानो में पैरा दान करने का आग्रह किया जा रहा है, जिले में शासन प्रशासन द्वारा बड़ी संख्या में गौठान तैयार किए गए हैं, ताकि घुमंतू मवेशी गाय, बछड़ों को एक स्थान में चारा मिल सके। इसके लिए चारा पानी की व्यवस्था ग्राम पंचायत द्वारा तो किया जाता है, लेकिन इसमें किसानों की सहभागिता हो जाए तो चारे की दित ही ना हो।

Posted By: Nai Dunia News Network

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