कवर्धा (नईदुनिया न्यूज)। छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में मशहूर भोरमदेव के एतिहासिक शिव मंदिर पर अब अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है। दरअसल जिले में बीते पांच दिन से लगातार हो रहे वर्षा के कारण भोरमदेव मंदिर के भीतर पानी रिसने लगा। शुक्रवार की सुबह पानी टपकने के कारण मंदिर के भीतर पानी पहुंच चुका था। इसे जैसे तैसे बाहर निकाला गया। तेज वर्षा में छत टपकने की वजह से मंदिर के गर्भगृह में पानी भरता जा रहा था। इधर पुरातत्व विभाग और प्रशासन मंदिर की इस हालत से बेखबर था। इस संबंध में कबीरधाम कलेक्टर जनमेजय महोबे ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए पुरातत्व विभाग को पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया गया है।

गौरतलब है कि भोरमदेव शिव मंदिर का निर्माण नागर शैली में करीब एक हजार वर्ष पूर्व किया गया था। नागवंशी शासक देवराज द्वारा बनवाए गए इस मंदिर में गोंड राजाओं के देवता भोरमदेव की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के मंडप में रखी हुई एक दाढी-मूंछ वाले योगी की बैठी हुई मूर्ति पर एक लेख लिखा है। जिसमें इस मूर्ति के निर्माण का समय कल्चुरी संवत 840 दिया है। हजार साल पुराने इस शिव मंदिर को भी पुरातत्व विभाग की नजर लग चुकी है विभाग की अनेदखी के कारण मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड़ चुका है। मंदिर में जगह-जगह वर्षा के पानी का रिसाव हो रहा है जो मंदिर के लिये खतरा बना हुआ है। वर्षा होने पर स्थिति और ज्यादा खराब हो जाती है। मंदिर में घुसने से लेकर गर्भगृह तक जगह-जगह पानी टपकता रहता है। दूसरी ओर शुक्रवार से जिले में वर्षा का दौर कम हुआ है। शुक्रवार को वर्षा कम दर्ज की गई। इस कारण लोगों ने राहत की सांस ली है। वैसे बीते 5 दिन में 100 मिमी से ज्यादा वर्षा हो चुकी है।

वर्षा के कारण बिगड़ रहीं स्थिति

भोरमदेव मंदिर की बनावट और कलाकृति की तुलना मध्य प्रदेश के खजुराहो और उड़ीसा के कोणार्क के मंदिर से की

जाती है।

मंदिर पर ध्यान नहीं

तीन साल पहले पुरातत्व विभाग ने मंदिर को लेकर गाइडलाइन जारी किया था। मंदिर के उचित रखरखाव के लिए कैमिकल पॉलिश करने, मंदिर के पास बड़े पेड़ को काटने और मंदिर के चारों ओर 5 फीट तक गहरा करके सीमेंट से मजबूती देने का दावा किया गया था। हाल में हुए वर्षा के कारण मंदिर के आसपास के क्षेत्र में पानी भर गया था। सबसे बड़ी राहत की बात है कि सावन का माह भी अब खत्म हो गया है। ऐसे में यहां अब भक्तों की संख्या भी कम हो गई है। आमतौर पर पूरे सावन माह में यहां करीब 20 हजार से अधिक शिव भक्त पहुंचे हुए थे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सदस्य जिला पुरातत्व समिति कबीरधाम आदित्य श्रीवास्तव ने कहा कि प्राचीन विरासतों का संरक्षण आनेवाली पीढ़ी की जिम्मेदारी होती है। भोरमदेव न केवल छत्तीसगढ़ का आध्यात्मिक गौरव है बल्कि पूरे भारतवर्ष का महत्वपूर्ण पुरातात्विक संपदा है। ज्ञात हुआ है कि भोरमदेव मंदिर में पानी रिसाव हो रहा है। यह मंदिर पुरातत्व विभाग का संरक्षित स्मारक है और इसमें कुछ भी निर्माण कार्य करना विभाग की जिम्मेदारी है, क्यों नहीं पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग समय समय पर इनका निरीक्षण करवाती है। स्थानीय स्तर पर केवल इतना किया जा सकता है कि मंदिर के ऊपर जो पत्ते, कचरे,धूल आदि गड्ढों में जमे होंगे तो उन्हें साफ करवा सकते हैं। पानी रिसने का एक कारण इनका जमा होना भी है। वैसे भी वर्षा से पूर्व मंदिर के ऊपर के कचरों को साफ कराना चाहिए। संचालक पुरातत्व छ ग को चाहिए कि वे अपने यहां के रसायनज्ञ एवं एक्सपर्ट को भेजकर भोरमदेव मंदिर का निरीक्षण करवाएं कि कहीं पर दरार तो नहीं आ रहा है और आवश्यकतानुसार मरम्मत करवाएं।

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