कोंडागांव। छत्तीसगढ़ बस्तर क्षेत्र में जनजातियों और कुछ अन्य जातियों के नारियों में गोदने का रिवाज पारंपरिक रूप से चला आ रहा हैं। बस्तर के वन में निवास करने वाले अबुझमाड़िया, दंडामी माड़िया, मुरिया, राऊत, मरार, पनका, कलार, हल्बा, भतरा, गडवा, दोरल्ली आदि अपने बस्तरियाँ रिति रिवाज के लिए बहुर्चित हैं। क्षेत्र नारियां आज भी बड़ी ललक के साथ गुदना गुदवाती हैं।

गोदना का संबंध तो आदिवासी नारियों में जन्मजात सौंदर्य भावना से जुड़ा हुआ हैं। आदिवासी लोक जीवन में यह उसी प्रकार व्याप्त हैं। जिस भाती जल में शीतल, आग में उष्णता और दुध में नवनीत समाहित है। सौंदर्य के प्रति जागरूक नारियों में ही विशेष होता हैं। यहीं कारण है कि बस्तर में आदिवासी पुर्स्षों के अपेछा नारियां कही अधिक अपने शरीर पर गोदना गुदवाती हैं। अपने को अधिक सुंदर बनाकर अपने प्रेमी को रिझाने के उद्देश्य से माथे, ठुड्डी, गालो, नाक, गले, हाथ, पाव, तलवे, एड़ी आदि में नवयुवती अच्छी से अच्छी आकृर्तियों के गोदने गुदवाती हैं और अधिक सुंदर व श्रेष्ठ लगती हैं।

गोदना पारंपरिक का शुरुआत

आदिवासी मान्यता के अनुसार ग्रामीणों के बीच ग्राम देवी धरती मां प्रगट हुई और लोगों को कहा अपने कुंवारी महिलाओं को सुअर के खून से शरीर में गोदना गोधने की बात किया है। इस प्रकार गोदना पारंपरिक का शुरुआत हुआ है। गोदनों से रोग, दुख कम होता हैं और शक्ति आती है। मूल निवासी व जनजाति पूर्वज देवी-देवता वक्त पर रक्षा करती हैं, विपतियां नहीं आती। गोदना स्मृति चिह्न और मधुर संबंध के प्रतीक के रूप में भी गुदवाया जाता है। शरीर के विभिन्ना भागों में विशेष प्रकार की आकृर्ति गुदवाने से विभिन्ना समस्यों का निराकरण होता हैं। महिलाओं में काम वासना को सीमित करने की यह प्राचीन विधि भी हो सकती हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close