पूनमदास मानिकपुरी, कोण्डागांव। अपनी अनोखी परंपरा, संस्कृति और देवी-देवताओं की धार्मिक आस्था के लिए के लिए प्रख्यात बस्तर की खूबसूरत वादियों में सदियों पुरानी एक ऐसी गुफा विद्यमान है जहां स्थित शिवलिंग को भगवान शिव का स्त्री रूप लिंगेश्वरी माता के रूप में पूजा होती आ रही है। साल में एक सिर्फ एक बार इस मंदिर के पट खुलते हैं और ऐसी मान्यता है कि यहां आने वाले निःसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ती होती है। इस मंदिर और आस्था के पीछे क्या कहानी है, आइए जानें।

जिला मुख्यालय कोंडागांव से लगभग 38 किलोमीटर की दूरी पर फरसगांव से बड़े डोंगर मार्ग में ग्राम आलोर स्थित है। आलोर को बस्तर रियासत की प्राचीन कचहरी भी कहा जाता है। आलोर ग्राम के झांटीबंध पारा में स्थित पहाड़ी में एक पुरानी गुफा स्थित है। जिसका द्वार वर्ष में सिर्फ एक ही दिन नयाखानी पर्व के बाद आने वाले प्रथम बुधवार को खुलता है।

पहाड़ी गुफा में ऐसे प्रवेश करते हैं श्रद्धालु

यहां प्रतिवर्ष आने वाले श्रद्धालु महेश कुमार नाग ने बताया कि इस बार अंचल में निवासरत सर्व आदिवासी समाज द्वारा नयाखानी पर्व मनाया गया और बुधवार को गुफा का प्रवेश द्वार खुला है। ग्राम आलोर के उत्तर-पश्चिम दिशा में एक पहाड़ी में विशाल चट्टान से बनी स्तूपाकार गुफा के अंदर शिवलिंग स्थित है। जिसमें सुरंगनुमा प्रवेश द्वार से लेटते हुए श्रद्धालु गुफा के अंदर घुसते हैं। गर्भगृह में पूजा के लिए सिर्फ 15-20 लोग एक बार में बैठ सकते हैं। गुफा के अंदर बीचों-बीच पत्थर का डेढ़ से दो फीट ऊंचा शिवलिंग स्थित है। जिसे स्थानीय हल्बी बोली में 'लिंगई आया' (लिंगई माता) कहते हैं। कहा जाता है कि यह शिव लिंग की आकृति साल दर साल धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है।

निसंतान दंपतियों के लिए वरदान

क्षेत्रवासियों के बीच मान्यता है कि निःसंतान दंपतियों को यहां आकर मन्नत मांगने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। छत्तीसगढ़ के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदी राज्यों से बड़ी तादात में निःसंतान दंपति यहां पहुंचते हैं ।

चढ़ता है खीरे का प्रसाद

यहां मन्नत मांगने का तरीका भी अनोखा है। संतान की कामना लेकर पहुंचने वाले दंपतियों को पूजन के दौरान खीरा चढ़ाना अनिवार्य है। खीरे को पुजारी द्वारा प्रसाद स्वरूप दंपती को वापस दिया जाता है, जिसे दंपती नाखून से फाड़कर गुफा के अंदर ही कड़ुए भाग सहित ग्रहण करते हैं। मनोकामना पूर्ण होंने की स्थिति में दंपती दूसरे वर्ष पुत्र या पुत्री को लेकर दर्शन लाभ लेने आते हैं।

गुफा के अंदर मिलते हैं भविष्य के संकेत

यह प्राकृतिक शिवालय पूरे प्रदेश में आस्था और श्रद्घा का केंद्र है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूजा के बाद मंदिर की सतह (चट्टान) पर रेत बिछाकर उसे बंद किया जाता है। अगले वर्ष इस रेत पर किसी जानवर के पदचिन्ह अंकित मिलते हैं। निशान देखकर भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाया जाता है।