Chhattisgarh News: कोरबा। श्रीराम लला की जन्मभूमि अयोध्या में मंदिर निर्माण के भूमिपूजन का उत्सव बुधवार को सारे देश ने मनाया। इस पुनीत कार्य को सफल बनाने कोरबा की पावन भूमि से भी एकत्र पवित्र मिट्टी भेजी जा रही। वजह सिर्फ एक, वनवास के दौरान श्रीराम, माता जानती और भैया लक्ष्मण के चरण इस धरती पर भी पड़े। कोरबा में स्थित सुअरलोट से लगी पहाड़ियों में ऐसे ही प्राचीन शैलचित्र मिले हैं, जिनमें श्रीराम आगमन के चिन्ह देखे जा सकते हैं। यहां दुल्हा-दुल्ही पहाड़ के शैलचित्रों में है सीताहरण की कहानी देखी व पढ़ी जा सकती है।

जिले के करतला विकासखंड में ग्राम पंचायत खूंटाकुड़ा के धंवईभाठा से लगे सुअरलोट की पहाड़ियों में भी श्रीराम के वनवास से जुड़े कई शैलचित्र मिले हैं। जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा के मार्गदर्शक हरिसिंह क्षत्री कहते हैं कि रामायण के कथानक के आधार पर भगवान राम की माता शबरी से भेंट सीता हरण के बाद हुई। कुछ विद्वान जांजगीर-चांपा जिले के शिवरीनारायण को ही माता शबरी से भगवान राम का मिलन स्थल मानते हैं। खरौद को खर व दुषण की नगरी मानते हैं, तो फिर शिवरीनारायण के पहले ही पंचवटी होना चाहिए। तथ्यों के आधार पर यदि प्राचीनकाल में आदिमानवों के वास्तविक चित्रों के बनाए जाने की अवधारणा है तो इस आधार पर निश्चित तौर पर कोरबा व जांजगीर-चांपा के बीच आधा-आधा बंटा यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्षत्री का मानना है कि कोरबा जिले की सुअरलोट पहाड़ी पर स्थित सीता चौकी के शैलचित्र का शीर्षक सीताहरण होना चाहिए। इसे ध्यान से देखने और विचारने की आवश्यकता है। सबसे पहले रावण का मारीच से मिलना और उन्हें हिरण बनने कहना, हिरण बनकर पंचवटी के पास जाना, सीता का मृग देखना, पकड़ने राम से कहना, तत्पश्चात लक्ष्मण को श्रीराम की मदद के लिए जाने को कहना, लक्ष्मण का रेखा खींचना, पंचवटी में रावण का प्रवेश व सीता का हाथ पकड़कर उन्हें विमान में बिठाकर लंका ले जाना जैसी घटनाओं का चित्रण मिलता है।

गिद्घराज पहाड़ी पर जटायू का आश्रम

यह शैलचित्र लगभग 25 फीट लंबे हैं। जिस क्षेत्र में यह शैलचित्र हैं, उसे स्थानीय ग्रामीण दुल्हा-दुल्ही पहाड़ कहते हैं। यहां से लगभग तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर सीता चौकी है, जिसमें दो चित्र ज्यामितीय हैं। दो रेखाएं एक-दूसरे को काटती हैं। क्षत्री का मानना है कि सीताहण की घटना इसी ऋ षभ तीर्थ से हुई। इस पहाड़ी पर एक और महत्वपूर्ण स्थान पंचवटी भी है, जिसे काल वराहकल्प राम आश्रम कहते हैं। यहां से करीब पांच मील की दूरी पर स्थित एक पहाड़ी को गिद्घराज पहाड़ कहते हैं, जिसमें महात्मा जटायू का आश्रम होना माना जाता है। इसके उत्तर में उमा-शिव का आश्रम होने की बात कही जाती है। इसके पास ही कुंभज ऋ षि का आश्रम था। इसे कुम्हार पहाड़ी कहते हैं।

रावण-मारीच ने रैनखोल में रचा षडयंत्र

ऐसी मान्यता है कि इसी क्षेत्र में सीता आश्रम व रावण खोल नामक का स्थल भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि रावण ने मारीच के साथ यहीं सीताहरण का षडयंत्र रचा। मारीच का वह स्थल ही रैनखोल कहा जाता है। पंचवटी से करीब चार मील की दूरी पर पंच झरोखा है, जिसे राम झोझा के नाम से जाना जाता है। यहां एक शिला पर पद चिन्ह भी मिले हैं, जिसे राम पद चिन्ह कहा जाता है। मान्यता है कि सीताहरण के बाद श्रीराम खरौद होते हुए शिवरीनारायण आए। जिले के धरोहरों पर नजर रखने वाले पुरातत्व संग्रहालय के मार्गदर्शक हरीसिंह क्षत्री ने क्षेत्र के इतिहास व अपनी खोज से जुड़े तथ्य एवं दस्तावेज जिला प्रशासन को सौंपे हैं।

विमान की अवधारणा भी की गई स्वीकार

क्षत्री के अनुसार यहां के शैलचित्र चलायमान हैं, जिसकी पुष्टि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग के भागीरथी गड़तिया व डॉ. शंभुनाथ यादव कर चुके हैं। डॉ. जीएल बादाम ने भी पहली बार शैलचित्रों में विमान होने की अवधारणा को स्वीकार किया है। क्षत्री कहते हैं कि तमाम तथ्यों के आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि जांजगीर-चांपा जिले के रैनखोल स्थित पंचवटी ही रामायण में वर्णित पंचवटी है और यहीं से माता सीता का हरण हुआ था। इसी कारण कालांतर में इन्हीं यादों को अक्षुण्य रखने के लिए कलाकार अथवा किसी जानकार व्यक्ति ने इतिहास लिखने के लिए व उन्हें सुरक्षित करने के लिए यहां शैलचित्रों की रचना की। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोरबा जिले में मिले शैलचित्र प्रारंभिक इतिहासकाल के एक महाकाव्य का एक खंड है।

एएसआई से 3000 साल पुराने होने की पुष्टि

क्षत्री को वर्ष 2013 में सुअरलोट की पहाड़ियों में गुफा के द्वार पर प्राचीन शैल चित्र मिले थे। प्रमाणित करने प्रशासन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रायपुर के अधीक्षक डॉ.अरूण राज को आग्रह किया था। पुरातत्वविद गड़तिया व डॉ.शंभूनाथ की टीम ने शैलचित्रों का निरीक्षण किया व पाए गए शैल चित्रों के तीन हजार साल पुराने होने की पुष्टि की। रिपोर्ट में प्रागैतिहासिक मानव निर्मित होने की बात स्वीकार करते हुए कहा गया है कि रैनखोल के शैलचित्र ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला गया है। इस चित्र में शैलाश्रम 12 मीटर लंबा है व दो मानव आकृतियों का अंकन मोटे ब्रश व गेरू रंग से किया गया है। इस आकृतियों के निकट एक जानवर का चित्रण भी किया गया है। बनावट के आधार पर इनकी संभावित तिथि लगभग प्रारंभिक इतिहास काल की मानी जा सकती है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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