कोरबा । सरकार की मजदूर विरोधी आर्थिक नीतियों का खिलाफत करते हुए मजदूरों के हड़ताल करने के बाद भी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इससे खनिज उत्खनन क्षेत्र के दरवाजे घरेलू एवं विदेशी स्वामित्व दोनों तरह की कंपनियों के लिए खोल दिया है, यानी सरकार ने देश में कोयले के खनन और बिक्री के लिए पात्रता शर्तों और नियमों को आसान बना दिया है। केंद्र की इस नीति के विरोध में श्रमिक संघ लामबंद होते हुए विरोध करने जुट गए हैं और सरकार से पुनर्विचार की मांग की है।

कोयला क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की घोषणा कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी ने अपने उद्बोधन में पिछले दिनों कही। इसमें कहा गया है कि नीलामी में वही हिस्सा ले सकता था, जिसके पास देश में कोयला खनन का कारोबार था, लेकिन अब इस शर्त को पूरी तरह हटा दिया गया।

सरकार ने दावा किया कि देश में कोयला खनन व्यवस्था में बदलाव से आयात बिल में कमी लाने का रास्ता साफ हो गया है। इस पर एटक कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए वरिष्ठ नेता दीपेश मिश्रा ने कहा कि खनिज कानून संशोधन अध्यादेश 2020 के जरिए सरकार ने भारत में कोयले के राष्ट्रीयकरण को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

उन्होंने कहा फिलहाल कोल इंडिया लिमिटेड और सिंगरेनी कोलियरीज लिमिटेड देश के कुल कोयला उत्पादन का 90 फीसदी से भी अधिक उत्पादन करते हैं। इससे बहुत बड़ा हिस्सा अब बहुराष्ट्रीय व निजी कंपनियों के हाथ चला जाएगा, जो कोल इंडिया के लिए बहुत विषम परिस्थिति होगी।

अगर सीआइएल को अपनी बाजार हिस्सेदारी बनाए रखनी है, तो उसे कोयला उत्खनन एवं आपूर्ति दोनों मोर्चे पर अपनी क्षमता बढ़ानी होगी तथा खुले बाजार में कीमतों के जंग में उसे जबरदस्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसका सीधा असर कोयला मजदूरों पर पड़ेगा।

बहुराष्ट्रीय और निजी कंपनियां कोयला उत्पादन लागत कम रख सस्ता में कोयला बाजार में बेचेगी। कोल इंडिया को बाजार में बने रहने के लिए अपने वर्तमान कोयला उत्पादन लागत को और घटाना पड़ेगा, तभी वह बाजार में टिक पाएगी।

आज की बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर सरकार के लाए गए अध्यादेश पर पुनर्विचार किए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। बैठक में धरमा राव, सुभाष सिंह, एनके दास, राजेश पांडे, नंदकिशोर साव, राजू श्रीवास्तव, महेंद्र प्रताप सिंह, सुनील राठौर, विश्वजीत मुखर्जी, रमाकांत शर्मा, नरेंद्र राठौर, सुबोध सागर, देवाशीष डे आदि उपस्थित रहे।

सरकार विदेशी कंपनियों के दबाव में : दीपेश

दीपेश मिश्रा ने कहा कि इस कवायद में कोल इंडिया प्रबंधन सबसे पहले मजदूरों के वेतन और कल्याणकारी सुविधाओं पर कैंची चलाएगी, जो मजदूरों के लिए घातक होगा। उन्होंने कहा कि वर्ष 1973-74 में कोयला क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर कोल इंडिया का गठन किया गया था और उसी समय से देश में कोयले के मांग के मुताबिक कोल इंडिया उत्पादन शुरू किया, जो अभी तक बरकरार है।

इसके बावजूद मौजूदा सरकार कारपोरेट घराने और विदेशी कंपनियों के दबाव में खनिज कानून संशोधन अध्यादेश 2020 के जरिए कोयले के राष्ट्रीयकरण का खत्म कर रही है। यह उचित नहीं है और इसका पूरी ताकत के साथ विरोध किया जाएगा।

Posted By: Nai Dunia News Network

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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